शूद्रों के गले में हांडी और कमर में झाड़ू बाँधने की प्रथा का संबंध मराठा साम्राज्य के पेशवा शासन (18वीं- 19वीं शताब्दी) से है।
1. प्रथा को किसने लागू किया?
1.1. पेशवा शासकों द्वारा प्रथा का संस्थानीकरण:
यह प्रथा मुख्य रूप से मराठा साम्राज्य के पेशवा शासन (18वीं-19वीं शताब्दी) द्वारा लागू की गई थी। पेशवा, जो ब्राह्मण जाति से थे, मराठा साम्राज्य के वास्तविक शासक बन गए थे (छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारियों के नाममात्र शासन के दौरान)। उन्होंने वर्णव्यवस्था को कठोरता से लागू करने की नीति अपनाई, जिसमें शूद्रों (विशेषकर महार, मांग, चमार जैसी दलित जातियों) को सामाजिक रूप से नीचा दिखाने के लिए यह प्रथा शुरू की गई।
प्रमुख पेशवा शासकः
* बाजीराव प्रथम (1720-1740): उनके काल में जातिगत नियमों को सख्ती से लागू किया गया।
* बाजीराव द्वितीय (1796-1818): इनके शासनकाल में दलितों के प्रति अत्याचार चरम पर पहुँचे।
1.2. प्रथा लागू करने के पीछे का तर्क:
पेशवाओं ने इसे "धार्मिक शुद्धता" और "सामाजिक व्यवस्था" बनाए रखने के नाम पर लागू किया। उनका मानना था कि शूद्रों का स्पर्श या उपस्थिति सवर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) को "अपवित्र" कर देती है। इसलिए, दलितों को निम्नलिखित नियमों का पालन करने के लिए बाध्य किया गयाः
गले में हांडी (मटका):
* दलितों को गले में एक मिट्टी का बर्तन लटकाना पड़ता था, जिसमें वे अपना थूक एकत्र करते थे। इसका उद्देश्य यह था कि वे जमीन पर थूककर सवर्णों के लिए "अशुद्धता" न फैलाएँ।
* यह प्रथा महाराष्ट्र के महार समुदाय पर विशेष रूप से लागू थी।
कमर में झाडू:
* दलितों को कमर में एक झाड़ू बाँधनी पड़ती थी, ताकि चलते समय उनके पैरों के निशान स्वतः मिट जाएँ।
* इसका संकेत था कि उनका अस्तित्व समाज के लिए "अदृश्य" होना चाहिए।
1.3. सामाजिक धार्मिक औचित्य:
पेशवाओं ने हिंदू धर्म के ग्रंथों (जैसे मनुस्मृति) की गलत व्याख्या करके इसे उचित ठहराया। मनुस्मृति के अनुसार, शूद्रों का कर्तव्य है कि वे "उच्च जातियों" की सेवा करें। पेशवाओं ने इसी आधार पर दलितों को मानवेतर समझते हुए उन पर ये प्रतिबंध लगाए।
1.4. प्रथा का राजनीतिक उद्देश्य
* ब्राह्मणवादी वर्चस्वः पेशवा स्वयं ब्राह्मण थे और उन्होंने ब्राह्मणों को समाज का शीर्ष स्थान दिलाने के लिए ये नियम बनाए।
* सैन्य नियंत्रणः दलित समुदाय (जैसे महार) को सेना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका न देकर उन्हें "निम्न कार्य" तक सीमित कर दिया गया।
1.5. ऐतिहासिक संदर्भ और प्रमाण
* ब्रिटिश दस्तावेज़: 19वीं सदी के ब्रिटिश अधिकारी माउंटस्टुअर्ट एल्फिन्स्टन ने अपनी पुस्तक "रिपोर्ट ऑन द टेरिटरीज कॉन्कर्ड बाय द पेशवा" (1819) में इस प्रथा का उल्लेख किया है।
* महार समुदाय की मौखिक परंपराएँ: महारों की लोककथाओं और गीतों में पेशवा शासन के दौरान झेली गई यातनाओं का वर्णन मिलता है।
1.6. प्रथा का प्रभाव
* मनोवैज्ञानिक अपमानः यह प्रथा दलितों को मानवीय गरिमा से वंचित करने वाली थी।
* आर्थिक शोषणः दलितों को सार्वजनिक कुओं, मंदिरों और शिक्षा से वंचित रखा गया, जिससे वे सदियों तक गरीबी के दलदल में फंसे रहे।
1.7. पेशवा शासन से पहले की स्थिति
* छत्रपति शिवाजी का युग (17वीं सदी): शिवाजी ने जातिगत भेदभाव को नकारते हए सभी जातियों को सेना और प्रशासन में अवसर दिए। उदाहरणः महार सैनिकों को उनकी सेना में शामिल किया गया।
* पेशवाओं का पतनः 1818 में भीमा कोरेगांव की लड़ाई में अंग्रेजों के हाथों पेशवाओं की हार के बाद यह प्रथा धीरे-धीरे कमजोर पड़ी, लेकिन इसकी छाया आजादी तक बनी रही।
[ यह प्रथा पेशवाओं द्वारा ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बनाए रखने और दलितों को सामाजिक-आर्थिक रूप से दबाने के लिए लागू की गई थी। इसके पीछे धार्मिक ग्रंथों की मनमानी व्याख्या और राजनीतिक नियंत्रण की मंशा थी। हालाँकि, इस प्रथा के खिलाफ दलित समुदाय ने संघर्ष किया, जो आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय आंदोलनों की नींव बना। ]
2. साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरोध
* कवयित्री हेमलता महिश्वरः
* उनकी कविताओं में पेशवा काल के अत्याचारों का वर्णन है।
उदाहरण:
"गले में हांडी, कमर में झाडू,
यह नहीं हमारी पहचान।
लड़कर छीन लेंगे अपना अधिकार,
यही है अब हमारी शान ।"
यह नहीं हमारी पहचान।
लड़कर छीन लेंगे अपना अधिकार,
यही है अब हमारी शान ।"
* प्रभावः ऐसी रचनाओं ने दलितों में आत्मसम्मान जगाया और सामूहिक प्रतिरोध को प्रेरित किया।
* अन्य साहित्यिक हस्तियाँ:
* नामदेव ढसाल (दलित पैंथर के संस्थापक) जैसे कवियों ने अपनी कविताओं में जाति उत्पीड़न को चुनौती दी।
* आत्मकथाएँ: बाबा साहेब आंबेडकर की "वेटिंग फॉर ए वीज़ा" और ऊषा जीवन की "कथा कही महारानी" जैसी रचनाओं ने ऐतिहासिक यातनाओं को दस्तावेज़ किया।
3. बौद्ध धर्म का प्रभाव और डॉ. आंबेडकर
* धर्मांतरण का निर्णय (1956):
• डॉ. आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया। यह कदम हिंदू वर्णव्यवस्था के सांस्थानिक विरोध का प्रतीक था।
• तर्कः उन्होंने बौद्ध धर्म को "समानता और तर्क" का धर्म बताया, जो जातिवाद को नकारता है।
* दीक्षाभूमि आंदोलनः
• आंबेडकर के बाद लाखों दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाकर सामाजिक पहचान बदली। यह आंदोलन आज भी जारी है, जैसे 2007 में 50वीं वर्षगाँठ पर 10 लाख लोगों का धर्मांतरण ।
4. सामाजिक आंदोलन और सहयोगी
ज्योतिबा फुले का योगदानः
* 19वीं सदी में फुले ने "सत्यशोधक समाज" की स्थापना कर शूद्र अतिशूद्रों को शिक्षित किया। उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनीं।
उच्च जाति के विरोधीः
* राजर्षि शाहू (कोल्हापुर के महाराज) ने दलितों के लिए शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण शुरू किया।
* गोपाल बाबा वालंगकर (ब्राह्मण) जैसे कुछ सुधारकों ने महार समुदाय के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई।
5. आधुनिक प्रतिरोधः दलित पैंथर से लेकर वर्तमान
दलित पैंथर (1970s):
* महाराष्ट्र में युवाओं ने अमेरिकी "ब्लैक पैंथर" से प्रेरित होकर इस संगठन की नींव रखी। उन्होंने साहित्य, कला और सड़क प्रदर्शन के माध्यम से जातिगत हिंसा के खिलाफ आवाज़ बुलंद की।
भीम आर्मी (2017):
* चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में यह संगठन दलित युवाओं को संगठित कर रहा है। साहित्यिक गोष्ठियाँ, विरोध रैली और कानूनी सहायता इनके मुख्य हथियार हैं।
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निष्कर्ष:
पेशवा शासन द्वारा शूद्रों पर थोपी गई गले में हांडी और कमर में झाडू बाँधने की प्रथा भारतीय इतिहास में जातिगत उत्पीड़न का एक क्रूर प्रतीक बन गई। यह प्रथा न केवल ब्राह्मणवादी वर्चस्व को स्थापित करने का औज़ार थी, बल्कि दलितों को मानवीय गरिमा से वंचित करके उन्हें सामाजिक-आर्थिक रूप से गुलाम बनाए रखने की एक सुनियोजित रणनीति भी थी। इसके पीछे धार्मिक ग्रंथों की मनमानी व्याख्या, राजनीतिक नियंत्रण की लालसा, और सवर्ण समाज के "शुद्धता" के भ्रमजाल को हवा देने की मंशा काम कर रही थी।
हालाँकि, इस प्रथा का प्रतिरोध दलित समुदाय की सामूहिक चेतना में हमेशा जीवित रहा। भीमा कोरेगांव की लड़ाई से लेकर आंबेडकर के बौद्ध आंदोलन तक, हर संघर्ष ने न केवल जातिवाद को चुनौती दी, बल्कि सामाजिक न्याय की नई परिभाषा गढ़ी। यह ध्यान देने योग्य है कि उच्च जाति के लोगों का समर्थन नगण्य रहा जो भारत की जटिल सामाजिक संरचना और सत्ता के असमान वितरण को उजागर करता है।
आज यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि मानवाधिकार और समानता की लड़ाई अधूरी है। कोरेगांव का स्तंभ, दलित साहित्य, और बौद्ध धम्म का प्रसार केवल अतीत की गाथाएँ नहीं, बल्कि वर्तमान में जातिवाद के खिलाफ प्रतिरोध की प्रेरणा हैं। शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी, और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से दलित समुदाय ने अपनी पहचान को पुनर्परिभाषित किया है, लेकिन संस्थागत भेदभाव और हिंसा के मामले आज भी समाज को कलंकित करते हैं।
अंततः, यह प्रथा और उसके विरोध की गाथा हमें सिखाती है कि इतिहास की निर्ममता को केवल स्मरण करने से नहीं, बल्कि उससे सबक लेकर एक समतामूलक समाज की रचना करने से ही पराजित किया जा सकता है। जैसा कि आंबेडकर ने कहा थाः "राजनीतिक सत्ता समाज में बदलाव की चाबी है, लेकिन सामाजिक चेतना उसकी नींव ।"
हालाँकि, इस प्रथा का प्रतिरोध दलित समुदाय की सामूहिक चेतना में हमेशा जीवित रहा। भीमा कोरेगांव की लड़ाई से लेकर आंबेडकर के बौद्ध आंदोलन तक, हर संघर्ष ने न केवल जातिवाद को चुनौती दी, बल्कि सामाजिक न्याय की नई परिभाषा गढ़ी। यह ध्यान देने योग्य है कि उच्च जाति के लोगों का समर्थन नगण्य रहा जो भारत की जटिल सामाजिक संरचना और सत्ता के असमान वितरण को उजागर करता है।
आज यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि मानवाधिकार और समानता की लड़ाई अधूरी है। कोरेगांव का स्तंभ, दलित साहित्य, और बौद्ध धम्म का प्रसार केवल अतीत की गाथाएँ नहीं, बल्कि वर्तमान में जातिवाद के खिलाफ प्रतिरोध की प्रेरणा हैं। शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी, और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से दलित समुदाय ने अपनी पहचान को पुनर्परिभाषित किया है, लेकिन संस्थागत भेदभाव और हिंसा के मामले आज भी समाज को कलंकित करते हैं।
अंततः, यह प्रथा और उसके विरोध की गाथा हमें सिखाती है कि इतिहास की निर्ममता को केवल स्मरण करने से नहीं, बल्कि उससे सबक लेकर एक समतामूलक समाज की रचना करने से ही पराजित किया जा सकता है। जैसा कि आंबेडकर ने कहा थाः "राजनीतिक सत्ता समाज में बदलाव की चाबी है, लेकिन सामाजिक चेतना उसकी नींव ।"