Monday, March 31, 2025

शूद्रों के गले में हांडी और कमर में झाड़ू किसने बँधवाई थी? इसका प्रचलन कब से तेज़ हो गया? क्या इसका विरोध किसी ने नहीं किया और किया तो किसने किया? क्या इसके विरोध में कोई उच्च जाति के लोग नहीं थे?

शूद्रों के गले में हांडी और कमर में झाड़ू बाँधने की प्रथा का संबंध मराठा साम्राज्य के पेशवा शासन (18वीं- 19वीं शताब्दी) से है।

1. प्रथा को किसने लागू किया?
 1.1. पेशवा शासकों द्वारा प्रथा का संस्थानीकरण:
यह प्रथा मुख्य रूप से मराठा साम्राज्य के पेशवा शासन (18वीं-19वीं शताब्दी) द्वारा लागू की गई थी। पेशवा, जो ब्राह्मण जाति से थे, मराठा साम्राज्य के वास्तविक शासक बन गए थे (छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारियों के नाममात्र शासन के दौरान)। उन्होंने वर्णव्यवस्था को कठोरता से लागू करने की नीति अपनाई, जिसमें शूद्रों (विशेषकर महार, मांग, चमार जैसी दलित जातियों) को सामाजिक रूप से नीचा दिखाने के लिए यह प्रथा शुरू की गई।

प्रमुख पेशवा शासकः
  * बाजीराव प्रथम (1720-1740): उनके काल में जातिगत नियमों को सख्ती से लागू किया गया।

  * बाजीराव द्वितीय (1796-1818): इनके शासनकाल में दलितों के प्रति अत्याचार चरम पर पहुँचे।
 1.2. प्रथा लागू करने के पीछे का तर्क:
पेशवाओं ने इसे "धार्मिक शुद्धता" और "सामाजिक व्यवस्था" बनाए रखने के नाम पर लागू किया। उनका मानना था कि शूद्रों का स्पर्श या उपस्थिति सवर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) को "अपवित्र" कर देती है। इसलिए, दलितों को निम्नलिखित नियमों का पालन करने के लिए बाध्य किया गयाः

गले में हांडी (मटका):
  * दलितों को गले में एक मिट्टी का बर्तन लटकाना पड़ता था, जिसमें वे अपना थूक एकत्र करते थे। इसका उद्देश्य यह था कि वे जमीन पर थूककर सवर्णों के लिए "अशुद्धता" न फैलाएँ।

  * यह प्रथा महाराष्ट्र के महार समुदाय पर विशेष रूप से लागू थी।

कमर में झाडू:
  * दलितों को कमर में एक झाड़ू बाँधनी पड़ती थी, ताकि चलते समय उनके पैरों के निशान स्वतः मिट जाएँ।
  * इसका संकेत था कि उनका अस्तित्व समाज के लिए "अदृश्य" होना चाहिए।

 1.3. सामाजिक धार्मिक औचित्य:
पेशवाओं ने हिंदू धर्म के ग्रंथों (जैसे मनुस्मृति) की गलत व्याख्या करके इसे उचित ठहराया। मनुस्मृति के अनुसार, शूद्रों का कर्तव्य है कि वे "उच्च जातियों" की सेवा करें। पेशवाओं ने इसी आधार पर दलितों को मानवेतर समझते हुए उन पर ये प्रतिबंध लगाए।

 1.4. प्रथा का राजनीतिक उद्देश्य
* ब्राह्मणवादी वर्चस्वः पेशवा स्वयं ब्राह्मण थे और उन्होंने ब्राह्मणों को समाज का शीर्ष स्थान दिलाने के लिए ये नियम बनाए।

* सैन्य नियंत्रणः दलित समुदाय (जैसे महार) को सेना और सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका न देकर उन्हें "निम्न कार्य" तक सीमित कर दिया गया।

 1.5. ऐतिहासिक संदर्भ और प्रमाण
* ब्रिटिश दस्तावेज़: 19वीं सदी के ब्रिटिश अधिकारी माउंटस्टुअर्ट एल्फिन्स्टन ने अपनी पुस्तक "रिपोर्ट ऑन द टेरिटरीज कॉन्कर्ड बाय द पेशवा" (1819) में इस प्रथा का उल्लेख किया है।

* महार समुदाय की मौखिक परंपराएँ: महारों की लोककथाओं और गीतों में पेशवा शासन के दौरान झेली गई यातनाओं का वर्णन मिलता है।

 1.6. प्रथा का प्रभाव
* मनोवैज्ञानिक अपमानः यह प्रथा दलितों को मानवीय गरिमा से वंचित करने वाली थी।

* आर्थिक शोषणः दलितों को सार्वजनिक कुओं, मंदिरों और शिक्षा से वंचित रखा गया, जिससे वे सदियों तक गरीबी के दलदल में फंसे रहे।

 1.7. पेशवा शासन से पहले की स्थिति
* छत्रपति शिवाजी का युग (17वीं सदी): शिवाजी ने जातिगत भेदभाव को नकारते हए सभी जातियों को सेना और प्रशासन में अवसर दिए। उदाहरणः महार सैनिकों को उनकी सेना में शामिल किया गया।

* पेशवाओं का पतनः 1818 में भीमा कोरेगांव की लड़ाई में अंग्रेजों के हाथों पेशवाओं की हार के बाद यह प्रथा धीरे-धीरे कमजोर पड़ी, लेकिन इसकी छाया आजादी तक बनी रही।

[ यह प्रथा पेशवाओं द्वारा ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बनाए रखने और दलितों को सामाजिक-आर्थिक रूप से दबाने के लिए लागू की गई थी। इसके पीछे धार्मिक ग्रंथों की मनमानी व्याख्या और राजनीतिक नियंत्रण की मंशा थी। हालाँकि, इस प्रथा के खिलाफ दलित समुदाय ने संघर्ष किया, जो आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय आंदोलनों की नींव बना। ]

2. साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरोध

* कवयित्री हेमलता महिश्वरः
  * उनकी कविताओं में पेशवा काल के अत्याचारों का वर्णन है।
  उदाहरण:
  "गले में हांडी, कमर में झाडू, 
  यह नहीं हमारी पहचान।  
  लड़कर छीन लेंगे अपना अधिकार,
  यही है अब हमारी शान ।"

  * प्रभावः ऐसी रचनाओं ने दलितों में आत्मसम्मान जगाया और सामूहिक प्रतिरोध को प्रेरित किया।

* अन्य साहित्यिक हस्तियाँ:
  * नामदेव ढसाल (दलित पैंथर के संस्थापक) जैसे कवियों ने अपनी कविताओं में जाति उत्पीड़न को चुनौती दी।
  * आत्मकथाएँ: बाबा साहेब आंबेडकर की "वेटिंग फॉर ए वीज़ा" और ऊषा जीवन की "कथा कही महारानी" जैसी रचनाओं ने ऐतिहासिक यातनाओं को दस्तावेज़ किया।

3. बौद्ध धर्म का प्रभाव और डॉ. आंबेडकर
* धर्मांतरण का निर्णय (1956):
  • डॉ. आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया। यह कदम हिंदू वर्णव्यवस्था के सांस्थानिक विरोध का प्रतीक था।
  • तर्कः उन्होंने बौद्ध धर्म को "समानता और तर्क" का धर्म बताया, जो जातिवाद को नकारता है।

* दीक्षाभूमि आंदोलनः
  • आंबेडकर के बाद लाखों दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाकर सामाजिक पहचान बदली। यह आंदोलन आज भी जारी है, जैसे 2007 में 50वीं वर्षगाँठ पर 10 लाख लोगों का धर्मांतरण ।

4. सामाजिक आंदोलन और सहयोगी

ज्योतिबा फुले का योगदानः
 * 19वीं सदी में फुले ने "सत्यशोधक समाज" की स्थापना कर शूद्र अतिशूद्रों को शिक्षित किया। उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनीं।

उच्च जाति के विरोधीः
* राजर्षि शाहू (कोल्हापुर के महाराज) ने दलितों के लिए शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण शुरू किया।

 * गोपाल बाबा वालंगकर (ब्राह्मण) जैसे कुछ सुधारकों ने महार समुदाय के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई।

5. आधुनिक प्रतिरोधः दलित पैंथर से लेकर वर्तमान

दलित पैंथर (1970s):
 * महाराष्ट्र में युवाओं ने अमेरिकी "ब्लैक पैंथर" से प्रेरित होकर इस संगठन की नींव रखी। उन्होंने साहित्य, कला और सड़क प्रदर्शन के माध्यम से जातिगत हिंसा के खिलाफ आवाज़ बुलंद की।

भीम आर्मी (2017):
 * चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में यह संगठन दलित युवाओं को संगठित कर रहा है। साहित्यिक गोष्ठियाँ, विरोध रैली और कानूनी सहायता इनके मुख्य हथियार हैं।
😊 😊 😊 😊 😊 😊 😊 😊 

निष्कर्ष:

पेशवा शासन द्वारा शूद्रों पर थोपी गई गले में हांडी और कमर में झाडू बाँधने की प्रथा भारतीय इतिहास में जातिगत उत्पीड़न का एक क्रूर प्रतीक बन गई। यह प्रथा न केवल ब्राह्मणवादी वर्चस्व को स्थापित करने का औज़ार थी, बल्कि दलितों को मानवीय गरिमा से वंचित करके उन्हें सामाजिक-आर्थिक रूप से गुलाम बनाए रखने की एक सुनियोजित रणनीति भी थी। इसके पीछे धार्मिक ग्रंथों की मनमानी व्याख्या, राजनीतिक नियंत्रण की लालसा, और सवर्ण समाज के "शुद्धता" के भ्रमजाल को हवा देने की मंशा काम कर रही थी।
हालाँकि, इस प्रथा का प्रतिरोध दलित समुदाय की सामूहिक चेतना में हमेशा जीवित रहा। भीमा कोरेगांव की लड़ाई से लेकर आंबेडकर के बौद्ध आंदोलन तक, हर संघर्ष ने न केवल जातिवाद को चुनौती दी, बल्कि सामाजिक न्याय की नई परिभाषा गढ़ी। यह ध्यान देने योग्य है कि उच्च जाति के लोगों का समर्थन नगण्य रहा जो भारत की जटिल सामाजिक संरचना और सत्ता के असमान वितरण को उजागर करता है।
आज यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि मानवाधिकार और समानता की लड़ाई अधूरी है। कोरेगांव का स्तंभ, दलित साहित्य, और बौद्ध धम्म का प्रसार केवल अतीत की गाथाएँ नहीं, बल्कि वर्तमान में जातिवाद के खिलाफ प्रतिरोध की प्रेरणा हैं। शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी, और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से दलित समुदाय ने अपनी पहचान को पुनर्परिभाषित किया है, लेकिन संस्थागत भेदभाव और हिंसा के मामले आज भी समाज को कलंकित करते हैं।
अंततः, यह प्रथा और उसके विरोध की गाथा हमें सिखाती है कि इतिहास की निर्ममता को केवल स्मरण करने से नहीं, बल्कि उससे सबक लेकर एक समतामूलक समाज की रचना करने से ही पराजित किया जा सकता है। जैसा कि आंबेडकर ने कहा थाः "राजनीतिक सत्ता समाज में बदलाव की चाबी है, लेकिन सामाजिक चेतना उसकी नींव ।"

Sunday, March 16, 2025

EWS का लाभ सिर्फ़ समान्य वर्ग को देना अन्याय। कैसे?

EWS (Economically Weaker Sections) आरक्षण, जो सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10% आरक्षण देता है, को लेकर "अन्याय" का आरोप निम्नलिखित आधारों पर लगाया जाता है:

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1. संवैधानिक और सिद्धांतगत विवाद
* सामाजिक न्याय के सिद्धांत से विचलन: भारतीय संविधान में मूल आरक्षण का
   आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन (अनुच्छेद 15-16) रहा है, न कि
   केवल आर्थिक स्थिति। EWS आरक्षण ने पहली बार आर्थिक आधार पर सामान्य
   वर्ग को विशेषाधिकार दिया, जो संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) के
   खिलाफ माना जाता है।  

* उच्चतम न्यायालय में आपत्तियाँ: 2022 के जनहित याचिका बनाम भारत 
   संघ मामले में कुछ न्यायाधीशों ने कहा कि EWS आरक्षण "समानता के
   अधिकार" (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करता है, क्योंकि यह SC/ST/OBC के
   गरीबों को बाहर करता है।

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2. SC/ST/OBC के गरीबों का बहिष्कार
EWS आरक्षण के नियमों के अनुसार, SC/ST/OBC वर्ग के लोग, चाहे वे कितने भी गरीब क्यों न हों, इस कोटे का लाभ नहीं उठा सकते। यह व्यवस्था "दोहरी अयोग्यता" पैदा करती है:  
* उदाहरण: एक दलित परिवार जिसकी आय ₹2 लाख सालाना है, वह EWS का
   लाभ नहीं ले सकता, जबकि सामान्य वर्ग का व्यक्ति ₹8 लाख तक आय होने पर
   भी EWS कोटे का हकदार है।  

* आँकड़े: NSSO के अनुसार, SC/ST समुदायों में गरीबी दर (20-30%) सामान्य वर्ग
   (15-20%) से अधिक है। ऐसे में, EWS का लाभ SC/ST/OBC के गरीबों तक न
   पहुँचना भेदभावपूर्ण है।

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3. आर्थिक मापदंडों की समस्याएँ
* ₹8 लाख की आय सीमा: EWS के लिए यह सीमा OBC के "क्रीमी लेयर" के
   बराबर है, जिसे अवास्तविक और उच्च माना जाता है। शहरी क्षेत्रों में ₹8 लाख
   आय वाला व्यक्ति "गरीब" नहीं होता, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह आय पर्याप्त 
   हो सकती है।  

* संपत्ति का मापदंड: 5 एकड़ से कम ज़मीन या 1000 वर्ग फुट से छोटे घर वाले
   ही EWS के पात्र हैं। यह मापदंड शहरी-ग्रामीण असमानता को नज़रअंदाज़ करता
   है।  

* असमान वितरण: आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के लिए व्यक्तिगत आय के
   बजाय परिवार की समग्र स्थिति (जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, ऋण) देखना ज़रूरी है,
   जो EWS में नहीं है।

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4. राजनीतिक एजेंडा और सामाजिक न्याय की उपेक्षा
* सामाजिक पिछड़ेपन की अनदेखी: EWS आरक्षण यह मानकर चलता है कि
   सामान्य वर्ग के गरीबों को केवल आर्थिक सहायता चाहिए, जबकि SC/ST/OBC
   को सदियों के जातिगत उत्पीड़न और संरचनात्मक असमानता का सामना करना
   पड़ा है।  

* आरक्षण का उद्देश्य: मूल आरक्षण सशक्तिकरण के लिए था, जबकि EWS
   "गरीबी उन्मूलन" का औज़ार बन गया, जो सरकारी नौकरियों तक सीमित है।  

* राजनीतिक लाभ: EWS को "सवर्ण वोट बैंक" को लुभाने के लिए एक जनवादी
   कदम माना जाता है, न कि सामाजिक न्याय की दृष्टि से डिज़ाइन किया गया
   उपाय।

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5. वैकल्पिक समाधान: क्या हो सकता था?
सार्वभौमिक आर्थिक आरक्षण: अगर EWS सभी वर्गों के गरीबों (SC/ST/OBC
   सहित) के लिए होता, तो यह न्यायसंगत होता।  

आय के स्थान पर बहुआयामी गरीबी सूचकांक: स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, और
   ऋण जैसे पैमानों पर गरीबी मापी जानी चाहिए।  

मौजूदा आरक्षण के साथ समन्वय: SC/ST/OBC कोटे में आर्थिक कमजोरों को
   प्राथमिकता दी जा सकती थी, ताकि "क्रीमी लेयर" को रोका जा सके।

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निष्कर्ष: "अन्याय" क्यों?  
EWS आरक्षण अन्यायपूर्ण है क्योंकि:  
1. यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत को कमजोर करता है।  
2. SC/ST/OBC के गरीबों को दोहरी अयोग्यता का शिकार बनाता है।  
3. आर्थिक मापदंड अव्यावहारिक और अपर्याप्त हैं।  
4. यह राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित लगता है, न कि समानता के लिए।  

समाधान: आरक्षण की नीति को सामाजिक + आर्थिक पिछड़ेपन के संयुक्त आधार पर डिज़ाइन किया जाना चाहिए, ताकि वंचित समूहों के साथ-साथ सभी वर्गों के गरीबों को न्याय मिल सके।

संघीय ढांचे में प्रतीकों पर विवाद एकदम निरर्थक है

आपके द्वारा उठाए गए विषयों पर विचार करते हुए, मैं निम्नलिखित बिंदुओं पर अपना विचार रखता हूँ:

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1. संघीय ढांचे और राज्यों के प्रतीक  
भारत का संविधान संघीय व्यवस्था को मान्यता देता है, जिसमें राज्यों को अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान को अभिव्यक्त करने का अधिकार है। यही कारण है कि अधिकांश राज्यों के अपने राजकीय चिह्न, पशु-पक्षी, या वृक्ष होते हैं। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु का चिह्न "मंडपम" उसकी द्रविड़ विरासत को दर्शाता है, जबकि उत्तर प्रदेश का चिह्न उसकी बहुआयामी संस्कृति का प्रतीक है। इन प्रतीकों पर विवाद करना न केवल संघीय भावना के विपरीत है, बल्कि यह राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करने का प्रयास भी माना जा सकता है।

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2. उत्तर प्रदेश के राजचिह्न का महत्व
उत्तर प्रदेश के राजचिह्न में मछली, राम का धनुष, संगम, गंगा-यमुनी तहज़ीब और मुस्लिम शासकों के प्रतीकों का समावेश है। यह ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है:  
- मछली: यह अवध क्षेत्र के ऐतिहासिक प्रतीक से जुड़ी हो सकती है। मछली
   को हिंदू परंपरा में समृद्धि और बौद्ध धर्म में ज्ञान का प्रतीक भी माना जाता है।  
- धनुष और संगम: ये अयोध्या और प्रयागराज जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्रों
   की पहचान हैं।  
- मुस्लिम प्रतीक: चाँद (कभी-कभी नवाबी शासन की याद दिलाता है) यह दर्शाता
   है कि उत्तर प्रदेश की पहचान किसी एक धर्म या काल तक सीमित नहीं है।  
- गंगा-यमुनी तहज़ीब: यह भारत की समन्वयवादी संस्कृति का प्रतीक है, जहाँ
   विविधता में एकता का भाव निहित है।  

इस चिह्न के नीचे योगी आदित्यनाथ का बैठना इस बात का उदाहरण है कि राजनीतिक नेतृत्व को इतिहास और संस्कृति के प्रति सम्मान दिखाना चाहिए, न कि उसे मिटाने का प्रयास करना चाहिए।

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3. तमिलनाडु पर आरोपों की विडंबना
जिस तरह उत्तर प्रदेश अपने चिह्न में विविधता को समेटे हुए है, उसी तरह तमिलनाडु का चिह्न भी उसकी स्थानीय पहचान को दर्शाता है। यदि किसी राज्य के प्रतीकों को "राष्ट्रविरोधी" बताया जाता है, तो यह दोहरे मापदंड को उजागर करता है। संघीय व्यवस्था में राज्यों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को कमजोर करने के बजाय, राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

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4. गंगा-जमुनी तहज़ीब' का सवाल
उत्तर प्रदेश के चिह्न में मुस्लिम शासकों के प्रतीकों का होना इस बात का प्रमाण है कि भारत की पहचान कभी एकांगी नहीं रही। यहाँ की सभ्यता ने सूफी संतों, भक्ति आंदोलन, और विभिन्न धर्मों के संवाद को आत्मसात किया है। इसलिए, किसी एक समुदाय या इतिहास को हटाने का प्रयास न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह राष्ट्र की आत्मा के विपरीत भी है।

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5. निष्कर्ष
राज्यों के प्रतीकों पर विवाद करने के बजाय, हमें इन्हें भारत की बहुलतावादी पहचान के रूप में देखना चाहिए। जैसे उत्तर प्रदेश का चिह्न "सत्यमेव जयते" (सत्य की विजय) के साथ विविधता को गले लगाता है, वैसे ही अन्य राज्यों के प्रतीक भी उनकी अनूठी कहानियाँ कहते हैं। राजनीतिक नेतृत्व को चाहिए कि वह इन प्रतीकों के माध्यम से लोगों को जोड़ने का काम करे, न कि तुष्टीकरण या विभाजन का हथियार बनाए।  

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अंतिम टिप्पणी: "गंगा-जमुनी तहज़ीब" केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है; यह पूरे भारत की साझा विरासत है। इसे बचाए रखने के लिए हमें अपने प्रतीकों, इतिहास और संवाद की शक्ति को समझना होगा।

केले का इतिहास और महत्व

केले का इतिहास और महत्व


■ GENUS MUSA
■ BANANA
■ UNITED FRUIT COMPANY
■ AMERICA & CIA
■ BANANA REPUBLIC


हम जिसे 'केला' कहते हैं दुनिया उसे 'BANANA' कहती है. 135 देशों में केला उगता है. और खाती पूरी दुनिया है. आज से 6000 हज़ार साल पहले " Genus Musa" जाति का पौधा जो 'केला' का जन्मदाता है केवल इंडोमलाया और ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता था.

5000 साल पहले पपुआ न्यू गिनी के आदिवासियों ने सर्वप्रथम केले की खेती की शुरूआत की. मलेशिया से होते हुए केला पूरे दक्षिण पूरब एशिया में फैल गया.

जहाजी यात्रियों ने केले को अफ्रीका से लेकर दक्षिण अमेरिका और कैरिबियाई देशों तक पहुंचा दिया.

◆◆◆
1870 अमेरिकी जहाजी कप्तान और व्यापारी लोरेंज डाओ बेकर ने जमैका में पहली बार केला खरीदा और उसे बोस्टन के बाजारों में दस गुना अधिक दम पर बेच दिया. अमेरिका के लोगों ने पहली बार केला खाया और उन्हें इतना भाया की वे केले के दीवाने हो गए.

1875 के बाद बड़ी तेजी से केला अमेरिकी बाजार में आने लगा और काफी लोकप्रिय हुआ. दो सेब के दाम पर एक दर्जन केला आसानी से मिल जाता और फाइबर युक्त भोजन पर डॉक्टरों की सलाह ने केले को कुछ ज्यादा ही अमेरिका में लोकप्रिय बना दिया. लेकिन अभी भी केला केवल अमीरों का फल था, और केले के प्रचंड व्यापार ने व्यापारियों को रातो रात अमीर भी बना दिया.

मांग के अनुसार केले की सप्लाई नही थी. यानी डिमांड ज्यादा थी और सप्लाई कम थी. केले के खेती के लिए अमरीकी जलवायु उपयुक्त नही था. पूरे अमेरिका की खेती कपास मक्का और गन्ने के खेतों से पटे पड़े थे.

◆◆◆
इसी कारण अमेरिका के पूंजीपतियों ने लैटिन अमेरिकी देशो के जंगलों को साफ किया. केले के खेती की शुरुआत की. अमेरिकी पूंजीपतियों की सहायता और मदद सेंट्रल अमेरिकी देश के स्थानीय नेताओं और सैनिक शासकों ने अपने देश की अस्मिता ताक पर रखकर किया.

होंडुरस, ग्वाटेमाला, पनामा, बेलीज़ जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में अमेरिका की यूनाइटेड फ्रूट कंपनी ने केले के व्यापार का 90% मार्केट पर अपना आधिपत्य जमा लिया. केले की मांग अमेरिका में जबरदस्त थी. यूनाइटेड फ्रूट कंपनी के दबाव में स्थानीय सरकारों ने कृषि क़ानूनों में किसानों की आय बढ़ाने के नाम पर भारी बदलाव किया. इस बदलाव का फायदा उठाया यूनाइटेड फ्रूट कंपनी ने.

केले की खेती के लिए अन्य फसलों की खेती बंद कराकर केवल केले की खेती कराई जाने लगी. यूनाइटेड फ्रूट कंपनी ने होंडुरस ग्वाटेमाला में कर्ज़ नीति के सहारे 70% से अधिक कृषि भूमि पर कब्ज़ा कर किसानों को अपना मजदूर बना लिया. आर्थिक रूप से होंडुरस और ग्वाटेमाला यूनाइटेड फ्रूट कंपनी पर निर्भर हो गए.

◆◆◆
केले की आपूर्ति बनाये रखने और इसके बाज़ारों पर नियंत्रण जारी रखने के लिए यूनाइटेड फ्रूट कंपनी ने लैटिन अमेरिकी देशो में अपनी राजनीतिक और आर्थिक हस्तछेप को बढ़ाया. मजदूरों पर दमन शोषण बढ़ गया, उन्हें बहुत कम वेतन देकर काम कराया जाता. लैटिन अमेरिका गरीब होने लगा और केले पर 2000% यानी बीस गुना अधिक मुनाफा कमाने वाली यूनाइटेड फ्रूट कंपनी अमीर और शक्तिशाली बन गयी.

लैटिन अमेरिकी देशों के जो शासक यूनाइटेड फ्रूट कंपनी पर नकेल कसने की कोशिश करता कंपनी CIA की मदद से उसका तख्ता पलट देती. इन देशों में सैन्य तानाशाही को बढ़ाया गया और किसी भी सामाजिक और आर्थिक सुधारों को मजबूती से कुचला गया.

कम्युनिस्ट नेताओं की हत्या की गई. कठपुतली शासकों से कंपनी मनमाना काम करा लेती. यूनाइटेड फ्रूट कंपनी ने होंडुरस और ग्वाटेमाला देश की डाक सेवा, रेलवे और रेडियो स्टेशन को अपने अधीन कर लिया.

◆◆◆
लैटिन अमेरिका के छोटे देश पूरी तरह यूनाइटेड फ्रूट कंपनी की कॉलोनी बन गए. कंपनी ने ऑक्टोपस की तरह इन देशों की सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को जकड़ लिया था. 1904 में लेखक ओ हेनरी ने अपनी किताब कैबेज ऑफ किंग्स में इस व्यवस्था को "BANANA REPUBLIC" का नाम दिया.

अमेरिका को केला खिलाने के नाम पर 1870 से 1980 के बीच 5,00,000 से अधिक लैटिन अमेरिकी आम नागरिकों को इसलिए मार दिया गया क्यों कि वह कंपनी की शोषण करने वाली नीति के खिलाफ थे.

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1. जन्मदाता और उत्पत्ति 
* प्राकृतिक विकास: केला (Musa spp.) एक प्राकृतिक फल है, जिसके जंगली पूर्वज Musa acuminata और Musa balbisiana हैं।  

* पहला पालन: इसे लगभग 7,000–10,000 साल पहले दक्षिणपूर्वी एशिया
   (आधुनिक पापुआ न्यू गिनी, इंडोनेशिया, मलेशिया) में पाला गया।  

2. खेती की शुरुआत
* प्रारंभिक केंद्र: पापुआ न्यू गिनी और इंडोनेशिया में पहली बार खेती।  
* वैश्विक प्रसार:  
  - अफ्रीका: व्यापारियों द्वारा 2000 BCE में ले जाया गया।  
  - मध्य पूर्व और यूरोप: इस्लामिक व्यापारियों (7वीं-8वीं सदी) के माध्यम से।  
  - अमेरिका: 15वीं-16वीं सदी में पुर्तगाली नाविकों ने ब्राजील और कैरिबियन में
     पेश किया।  

3. वैश्विक लोकप्रियता के कारण
- उपनिवेशवाद: यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका और अमेरिका में बागान स्थापित
   किए।  
- 19वीं सदी की तकनीक: रेफ्रिजरेटेड शिपिंग (1880 के दशक) ने केले को लंबी
   दूरी तक पहुँचाना संभव बनाया।  
- ब्रांडिंग और विपणन: यूनाइटेड फ्रूट कंपनी (अब चिक्विटा) और डोल
   कंपनी ने अमेरिका और यूरोप में केले को "सुपरफूड" के रूप में प्रचारित किया।  

4. केले से जुड़ी क्रांतियाँ/घटनाएँ
- बनाना रिपब्लिक्स: 20वीं सदी में मध्य अमेरिकी देशों (होंडुरास, ग्वाटेमाला)
   पर कंपनियों का आर्थिक/राजनीतिक नियंत्रण।  
- 1954 ग्वाटेमाला तख्तापलट: यूएस सीआईए ने यूनाइटेड फ्रूट कंपनी के हितों
   की रक्षा के लिए हस्तक्षेप किया।  
- श्रमिक आंदोलन: 20वीं सदी में कोस्टा रिका और कोलंबिया में केले के
   मजदूरों ने अधिकारों के लिए संघर्ष किया।  

5. केले में पाए जाने वाले पोषक तत्व
- पोटैशियम: हृदय स्वास्थ्य और रक्तचाप नियंत्रण।  
- विटामिन B6: मस्तिष्क स्वास्थ्य और ऊर्जा उत्पादन।  
- फाइबर: पाचन तंत्र को मजबूत करता है।  
- विटामिन C: प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा।  
- मैग्नीशियम: हड्डियों और मांसपेशियों के लिए उपयोगी।  

6. स्वास्थ्य लाभ
- ऊर्जा बूस्टर: प्राकृतिक शुगर (ग्लूकोज, फ्रुक्टोज) तत्काल ऊर्जा देते हैं।  
- हृदय स्वास्थ्य: पोटैशियम से हाई BP कम।  
- पाचन: फाइबर कब्ज को रोकता है।  
- मूड सुधार: ट्रिप्टोफैन सेरोटोनिन (खुशी हार्मोन) बनाता है।  
- एनीमिया रोकथाम: आयरन और फोलेट की मौजूदगी।  

7. वर्तमान स्थिति
- शीर्ष उत्पादक: भारत, चीन, फिलीपींस।  
- किस्में: कैवेंडिश (आधुनिक बाजार में 95%), ग्रोस मिशेल (पनामा रोग से विलुप्त)।  

निष्कर्ष:  
केले की यात्रा "जंगल से ग्लोबल" तक प्राकृतिक अनुकूलन, मानवीय नवाचार, और ऐतिहासिक घटनाओं का मिश्रण है। यह पोषण और सुविधा का प्रतीक बन गया है। 

Thursday, March 13, 2025

क्या सच में Bombay HC के द्वारा "जातिगत आरक्षण पर बोलना किसी समुदाय के खिलाफ नहीं माना जा सकता है, ऐसे मामले में SC ST के तहत केस भी दर्ज नही हो सकता" दिया फैसला उचित नहीं है?

BIG NEWS 🚨 BOMBAY HIGH COURT का फैसला न्याय संगत नही है.

हाल ही में Bombay High Court से एक फ़ैसला निकाल कर आता है जिसमें HC कहती है:- 

हाई कोर्ट : "जातिगत आरक्षण पर बोलना किसी समुदाय के खिलाफ नहीं माना जा सकता है, ऐसे मामले में SC ST के तहत केस भी दर्ज नही हो सकता।" 

कूछ लोगों का मानना है कि न्यायपालिका के द्वारा लिया गया यह फैसला पूरी तरह जातिवाद को बढ़ावा देगा.

उदाहरण : मुंबई नायर टोपीवाला मेडिकल कॉलेज में ST समाज की पायल ताडवी MD गायनेकोलॉजिस्ट की पढ़ाई कर रही थी. पायल ताडवी को होस्टल में जो कमरा अलॉट किया गया था,

उसमें जनरल कास्ट की तीन अन्य लड़कियां थी जो पायल ताडवी को आरक्षण पर ताना मारती थीं. आरक्षण की गाली देकर पायल ताडवी का मानसिक शोषण करती थी.

2019 में पायल ताडवी ने आत्महत्या कर ली। 

हाई कोर्ट का फैसला आरक्षण के नाम पर OBC SC ST को अपमानित करने वालों का हौसला बढ़ाएगा।

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मैं इसे किसी और नजर से देखने का कोशिश किया हूं - 

भारतीय संविधान और कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में, जातिगत आरक्षण पर वस्तुनिष्ठ और सम्मानजनक चर्चा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) के तहत संरक्षित माना जाता है। हालाँकि, SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को सामूहिक अपमान, उत्पीड़न या हिंसा से बचाना है। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि:

1. आरक्षण नीति की आलोचना ≠ जातिगत अपमान:  
   यदि चर्चा आरक्षण की नीतिगत खामियों पर केंद्रित है और किसी समुदाय को निशाना बनाकर अपमानजनक भाषा, रूढ़िवादी टिप्पणियाँ, या हिंसा भड़काने वाले बयान नहीं हैं, तो SC/ST अधिनियम के तहत मामला दर्ज नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020) में कहा कि "अधिनियम का उद्देश्य जातिगत पूर्वाग्रह से प्रेरित अत्याचारों को रोकना है, न कि नीतिगत बहस को दबाना।"

2. संदर्भ और भाषा की भूमिका:  
   यदि आरक्षण पर बहस में जातिगत स्टीरियोटाइप, घृणास्पद भाषा, या समुदाय विशेष को नीचा दिखाने का इरादा है, तो यह SC/ST अधिनियम के दायरे में आ सकता है। उदाहरणार्थ, "आरक्षण अयोग्यता को बढ़ावा देता है" जैसी टिप्पणी नीतिगत आलोचना है, जबकि "SC/ST समुदाय के लोग अयोग्य हैं" कहना जातिगत अपमान हो सकता है।

3. मनचलों के मनोबल का सवाल:  
   यदि कानूनी प्रक्रिया स्पष्ट रूप से वस्तुनिष्ठ आलोचना और जातिगत उन्माद के बीच अंतर करती है, तो इससे गलत इरादे वाले लोगों को बढ़ावा नहीं मिलेगा। हालाँकि, अगर अदालतें या प्रशासन भाषा के संदर्भ और इरादे को गंभीरता से नहीं लेते, तो दुरुपयोग की संभावना बढ़ सकती है। 

निष्कर्ष:  
* सही फैसला: नीतिगत आलोचना को SC/ST अधिनियम के दायरे से बाहर रखना संवैधानिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अनुकूल है।  
* सावधानी जरूरी: यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि "आलोचना" के बहाने जातिगत घृणा या अश्लील भाषा को बढ़ावा न मिले। इसके लिए न्यायपालिका को प्रत्येक मामले के संदर्भ, भाषा और इरादे का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना चाहिए।  
* जागरूकता की आवश्यकता: समाज में यह समझ बढ़ाना आवश्यक है कि नीति की आलोचना और समुदाय विशेष के प्रति घृणा में अंतर है। 

सारांश में, संतुलित कानूनी व्यवस्था ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय दोनों को सुनिश्चित कर सकती है।



आप अपनी राय Comment Section में दे सकते हैं। 

Wednesday, March 12, 2025

यज़ीदी धर्म के बारे में विस्तार से।

यज़ीदी धर्म एक प्राचीन और गूढ़ धार्मिक सम्प्रदाय है, जिसके अनुयायी मुख्य रूप से इराक, सीरिया, तुर्की और जॉर्जिया जैसे देशों में रहते हैं। इस धर्म की मान्यताएँ और रीति-रिवाज अद्वितीय हैं, और इसे अक्सर एकेश्वरवादी धर्म के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। यहाँ यज़ीदी धर्म के प्रमुख पहलुओं का विस्तृत विवरण दिया गया है:

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1. उत्पत्ति और इतिहास
*  यज़ीदी धर्म की जड़ें प्राचीन मेसोपोटामिया की धार्मिक परंपराओं में हैं, जिसमें ज़रथुस्त्रवाद, यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, और इस्लाम के तत्व शामिल हैं। यह माना जाता है कि इसकी स्थापना 12वीं शताब्दी में शेख अदी इब्न मुसाफ़िर ने की थी, जिन्हें यज़ीदी समुदाय में एक पवित्र व्यक्ति माना जाता है।

* यज़ीदी खुद को "एज़िदी" कहते हैं, जिसका अर्थ है "ईश्वर के उपासक"।

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2. मूल सिद्धांत और विश्वास
* एकेश्वरवाद: यज़ीदी ईश्वर को "यज़दान" कहते हैं, जो सर्वशक्तिमान और निराकार है।

* सात फरिश्ते: यज़ीदी मान्यता के अनुसार, ईश्वर ने सात फरिश्तों की रचना की, जिनमें सबसे प्रमुख ताऊस मेलेक (मोर फरिश्ता) हैं। ताऊस मेलेक को अक्सर गलत समझा जाता है, क्योंकि कुछ इस्लामिक परंपराओं में उन्हें "शैतान" के रूप में देखा जाता है। हालाँकि, यज़ीदी उन्हें ईश्वर का प्रतिनिधि और दुनिया का संरक्षक मानते हैं।

* पुनर्जन्म में विश्वास: यज़ीदी मानते हैं कि आत्मा पुनर्जन्म लेती है, लेकिन यह अवधारणा हिंदू या बौद्ध धर्म से भिन्न है।

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3. धर्मांतरण और मंदिरों तक पहुँच
* धर्मांतरण निषेध: यज़ीदी धर्म जन्माधारित है, अर्थात केवल यज़ीदी माता-पिता से जन्मे व्यक्ति ही इस धर्म को मान सकते हैं। धर्मांतरण की अनुमति नहीं है।

* मंदिरों में प्रवेश प्रतिबंध: यज़ीदी मंदिरों (जिन्हें "कुब्बा" या "मज़ार" कहा जाता है) में गैर-यज़ीदियों का प्रवेश वर्जित है। इसका कारण धार्मिक शुद्धता और परंपराओं की रक्षा करना है। उनका सबसे पवित्र तीर्थस्थल लालिश (इराक में स्थित) है, जहाँ गैर-यज़ीदियों को प्रवेश नहीं दिया जाता।

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4. धार्मिक ग्रंथ और रीति-रिवाज
* पवित्र ग्रंथ: यज़ीदियों के दो मुख्य ग्रंथ हैं—"कितेबा जिलवे" (किताबे रोशनी) और "मशाफ़ा रश" (काली किताब)। इनमें धार्मिक कथाएँ और नैतिक निर्देश हैं।

* प्रमुख उत्सव:
   *सरसल: नव वर्ष का त्योहार, जो अप्रैल में मनाया जाता है।
   *जेमायी: ताऊस मेलेक की पूजा का उत्सव।
   *च्रॉक च्रॉक: तीर्थयात्रा का समय, जब यज़ीदी लालिश जाते हैं।
   *बपतिस्मा: यज़ीदी बच्चों का जन्म के बाद बपतिस्मा किया जाता है।

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5. सामाजिक संरचना
* जाति प्रणाली: यज़ीदी समाज तीन जातियों में विभाजित है— शेख, पीर, और मुरीद। इन जातियों के बीच विवाह की अनुमति नहीं है।

*धार्मिक नेतृत्व: सर्वोच्च धार्मिक नेता **"मीर"** कहलाता है, जबकि **"बाबा शेख"** और **"फकीर"** अनुष्ठानों का नेतृत्व करते हैं।

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6. अत्याचार और चुनौतियाँ
*यज़ीदी समुदाय को ऐतिहासिक रूप से इस्लामिक समूहों, विशेषकर आईएसआईएस द्वारा क्रूर अत्याचारों का सामना करना पड़ा है। 2014 में सिन्जार क्षेत्र में हजारों यज़ीदियों का नरसंहार और महिलाओं का अपहरण इसका उदाहरण है।

* उनकी बंद धार्मिक प्रथाओं और ताऊस मेलेक की पूजा के कारण उन्हें "शैतानपूजक" कहकर भ्रामक रूप से प्रस्तुत किया जाता रहा है।

यज़ीदी समुदाय को ऐतिहासिक और वर्तमान समय में "अत्याचार और चुनौतियों"  का सामना करना पड़ा है, जो उनकी धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक पहचान से जुड़े हैं:-

(i) ऐतिहासिक अत्याचार
* इस्लामिक शासनों के दौरान: यज़ीदियों को मध्यकाल से ही इस्लामिक साम्राज्यों (जैसे ऑटोमन साम्राज्य) द्वारा "काफिर" या "शैतानपूजक" कहकर प्रताड़ित किया गया। उनकी धार्मिक प्रथाओं को इस्लाम के विरुद्ध माना गया।
* 19वीं-20वीं सदी: ऑटोमन शासन के दौरान यज़ीदियों को जबरन इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया। 1890 के दशक में अर्मेनियाई नरसंहार के दौरान भी उन्हें निशाना बनाया गया।

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(ii) 2014 का आईएसआईएस (ISIS) नरसंहार
* सिन्जार पर हमला: अगस्त 2014 में ISIS ने इराक के सिन्जार क्षेत्र (यज़ीदियों का मुख्य निवास स्थान) पर कब्जा कर लिया। इस दौरान:
* सामूहिक हत्या: हज़ारों यज़ीदी पुरुषों और बूढ़ों को मार डाला गया।
* महिलाओं का अपहरण: 6,000 से अधिक यज़ीदी महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाकर बेच दिया गया। इन्हें यौन हिंसा और जबरन धर्मांतरण का शिकार बनाया गया।
* बच्चों का सैन्यकरण: छोटे लड़कों को ISIS के लड़ाकों के रूप में प्रशिक्षित किया गया।
* जनसंख्या विस्थापन: लगभग 4,00,000 यज़ीदी अपने घरों से भागने को मजबूर हुए। आज भी हज़ारों शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं।

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(iii) "शैतानपूजक" का भ्रामक लेबल
* ताऊस मेलेक का गलत अर्थ: यज़ीदी ताऊस मेलेक (मोर फरिश्ते) की पूजा करते हैं, जिसे कट्टरपंथी इस्लामिक समूहों ने "शैतान" के रूप में गलत व्याख्या की। इसका कारण इस्लामी मान्यताओं में शैतान (इब्लीस) की कहानी से मिलता-जुलता प्रतीकवाद है।
* प्रभाव: इस भ्रांति के कारण यज़ीदियों को सदियों से धार्मिक उत्पीड़न, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ा। ISIS ने इसी लेबल का उपयोग करके उनके खिलाफ जिहाद को उचित ठहराया।

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(iv) वर्तमान चुनौतियाँ
* लापता महिलाएँ और बच्चे: हज़ारों यज़ीदी महिलाएँ और बच्चे अभी भी ISIS के पूर्व सदस्यों के कब्जे में हैं या अज्ञात स्थानों पर फंसे हुए हैं।
* सांस्कृतिक विनाश: ISIS ने यज़ीदियों के पवित्र मंदिरों और कब्रिस्तानों को नष्ट कर दिया, जिससे उनकी धार्मिक विरासत को गहरा आघात पहुँचा।
* मानसिक आघात: नरसंहार से बचे लोग गहरे मनोवैज्ञानिक आघात, PTSD, और सामाजिक अलगाव से जूझ रहे हैं।
* राजनीतिक उपेक्षा: इराक और अन्य देशों में यज़ीदियों को अक्सर राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कानूनी सुरक्षा का अभाव है।

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(v) अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
* संयुक्त राष्ट्र की पहल: 2016 में UN ने ISIS के अत्याचारों को "नरसंहार" घोषित किया और यज़ीदियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाए।
* मानवाधिकार संगठन: एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने यज़ीदियों की स्थिति पर रिपोर्ट प्रकाशित की हैं।
* पुनर्वास प्रयास: जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने हज़ारों यज़ीदी शरणार्थियों को अपनाया है। इराक में लालिश के पवित्र स्थल को फिर से बसाया जा रहा है।

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(vi) यज़ीदी प्रतिरोध और आशा
    सामुदायिक एकता: यज़ीदियों ने अपनी संस्कृति और धर्म को बचाए रखने के लिए अद्भुत लचीलापन दिखाया है। वे अपने त्योहारों और रीति-रिवाजों को गुप्त रूप से भी जारी रखते हैं।
    * नई पीढ़ी की आवाज़: युवा यज़ीदी नेता और सक्रियता करने वाले (जैसे नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नादिया मुराद) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रख रहे हैं।

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### निष्कर्ष
यज़ीदियों के खिलाफ हिंसा केवल धार्मिक कट्टरता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उनकी अल्पसंख्यक पहचान, सांस्कृतिक विशिष्टता, और राजनीतिक कमजोरी का भी प्रतीक है। 2014 की घटना ने दुनिया को यज़ीदियों की पीड़ा से परिचित कराया, लेकिन उनकी लड़ाई अभी भी जारी है—न्याय, पुनर्निर्माण, और मान्यता के लिए।


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7. यज़ीदी धर्म की विशिष्टता के कारण
   1. सांस्कृतिक संरक्षण: धर्मांतरण पर प्रतिबंध और मंदिरों में प्रवेश निषेध उनकी
       पहचान बचाए रखने की रणनीति है।

   2. मौखिक परंपरा: अधिकांश धार्मिक ज्ञान मौखिक रूप से हस्तांतरित होता है,
       जिससे बाहरी हस्तक्षेप का डर है।

   3. ऐतिहासिक उत्पीड़न: लगातार अत्याचारों के कारण समुदाय ने स्वयं को
       बाहरी दुनिया से अलग रखना चुना।

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8. वर्तमान स्थिति
आज दुनिया भर में लगभग 10-15 लाख यज़ीदी हैं, जिनमें से अधिकांश इराक में रहते हैं। उनकी संस्कृति और धर्म को यूनेस्को द्वारा संरक्षित सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता मिली है।

* अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उनके अधिकारों और सुरक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाई है, लेकिन उनकी धार्मिक स्वायत्तता और अस्तित्व की लड़ाई जारी है।

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[यज़ीदी धर्म अपनी गहन आध्यात्मिकता, प्रतीकवाद और सामाजिक एकता के लिए जाना जाता है। उनकी बंद प्रथाएँ उनके इतिहास, विश्वासों और बाहरी खतरों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया को दर्शाती हैं।]



यजीदी धर्म धर्मांतरण नहीं करते। इनके मंदिरों में गैर धर्मो के लोगों का प्रवेश निषेध है। क्या आप इस धर्म के बारे में जानते हैं?

यजीदी धर्म धर्मांतरण नहीं करते. इनके मंदिरों में गैर धर्मो के लोगों का प्रवेश निषेध है.

यजीदी धर्म की जड़े 3000 हज़ार साल से भी ज्यादा पुरानी हैं जो ज़ोरोस्ट्रीयन धर्म की आस्था से जुड़ी हैं. 

यजीदी धर्म मूल रूप से 11वीं शताब्दी में अस्तित्व में आया, जिसे उत्तरी इराक में रहने वाले कुर्दिश नस्ल के कुरमंजी भाषी लोगों ने अपनाया. 

◆◆
2014 में ISIS आतंकवादियों ने 40,000 यजीदियों को मौत के घाट उतार दिया.

नरसंहार से बचने के लिए यजीदी उत्तरी इराक की सिंजर की पहाड़ियों पर पनाह ली. यजीदी महिलाओं और बच्चियों को ISIS ने बाजारों में खुलेआम बेचा. 

ऐसा पहली बार नही हुआ है. 11वीं शताब्दी से लेकर अब तक यजीदियों का कई बार नरसंहार किया गया है. 

◆◆
कौन हैं यजीदी. दुनिया इनके बार में काफी कम जानती है कारण यहूदियों की तरह इनको कभी यूरोप और अमेरिका का उतना समर्थन नही मिला है. 

यजीदी कुर्दिश जनजाति का धर्म है. कुर्दिश अपनी गोरी चमड़ी को बचाए रखना चाहते हैं. रक्त शुद्धता के विचार में यकीन करते हैं. इसी कारण यजीदी धर्म में धर्मांतरण नही होता. 

पूरी दुनिया में मुश्किल से 11 लाख यजीदी हैं. इनमें से 7 लाख उत्तरी इराक में रहते हैं और जर्मनी में 2 लाख. बाकी रूस अरमेनिया ऑस्ट्रेलिया यूरोप और अमेरिका बसे हैं.

◆◆
यजीदी समुदाय के भीतर की आंतरिक संरचना इस प्रकार है. यजीदी धर्म तीन जातियां में विभाजित है.

1) पीर पुजारी वर्ग
2) शेख वर्ग
3) मुरीद वर्ग

शेख वर्ग में दो उपजातियां हैं - शासक जाति और धर्म गुरु या इमाम. इन्हें पीर अर्थात पुजारी बनने का पूरा अधिकार है.

मुरीद वर्ग में दो उपजातियां हैं - कोचेक (वेद), फकीर और आम जनमानस. फकीर को रुआबदार मूंछे रखने का हक़ नही और ना ही उन्हें शराब पीने का हक़ है.

शेख और मुरीद वर्ग आपस में अंतरजातीय विवाह नही कर सकते. सभी समुदाय को अपने वर्ग में ही विवाह करने का अधिकार है.

◆◆
आप लोग जानकर हैरान हो जाएंगे कई सदी तक यजीदी धर्म में पढ़ने लिखने का अधिकार केवल पीर यानी पुजारी वर्ग को ही था.

यजीदी सूर्य के उपासक हैं. 14वीं शताब्दी तक उत्तरी इराक और पूर्वी टर्की में यजीदियों की अच्छी खासी जनसंख्या थी. 

लेकिन इस्लाम ने यजीदी मुरीद समुदाय को अपने ओर आकर्षित कर लिया. बड़ी संख्या में यजीदी मुरीद मुसलमान बन गए. 

◆◆
जैसे ज़ोरोस्ट्रीयन धर्म लगभग खत्म होने की कगार पर है, यजीदी धर्म भी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है. 

यहूदी धर्म को अलग देश के रूप में इजरायल नही मिला होता तो यह भी धर्म भी अपने अस्तित्व को बचाने में जूझ रहा होता.

ज़ोरोस्ट्रीयन धर्म, यजीदी धर्म दोनों की जड़े इंडो ईरानियन है. यहूदी धर्म अब्रामिक धर्म है. तीनो धर्म में एक समानता है, कालांतर में एक खास जाति को पुजारी बनने का अधिकार है. येही समानता इन धर्मो में असमानता को दर्शाती है.

Photo : Yazid Women Holding Yazidi Temple Design
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ये यजीदी समुदाय की कहानी सुनकर रोंगटे खड़े हो गए। 73 बार नरसंहार, ISIS का वो बर्बरता भरा अत्याचार, और फिर भी ये लोग अपनी पहचान और धर्म बचाए हुए हैं—ये तो सुपरहीरो स्टोरी से कम नहीं! लेकिन सवाल ये है, दुनिया कब तक इनकी चीख सुनकर भी अनदेखा करती रहेगी? इनके लिए इंसाफ और सुरक्षा कब आएगी, या फिर बस ट्वीट्स और आर्टिकल्स तक सीमित रह जाएगा सब? ये बहुत हीशर्म की बात है!