Thursday, September 26, 2024

कबीर दास कौन थे? वह गुरु के सम्मान में क्या कह गए? क्या सच में कबीर दास पढ़े लिखे नहीं थे?

कबीर दास : वह कवि जो धर्म, जाती और भाषा से परे थे, वह जिन्होंने शिष्य को गुरु का मान करना सिखाया!


आप भले ही हिंदी साहित्य या हिंदी के लेखकों और कवियों से परिचित हो न हो पर संत कबीर का लिखा, ‘गुरु’ को समर्पित एक दोहा आप सभी ने ज़रूर पढ़ा या सुना होगा।

 15वीं सदी के मशहूर कवि कबीर दास की - कबीर की भाषाएँ, सधुक्कड़ी एवं पंचमेल खिचड़ी हुआ करती थी।  इनकी भाषा में आपको हिंदी भाषा की सभी बोलियों का मिश्रण मिलेगा, जिसमें राजस्थानी, हरयाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी तथा ब्रजभाषा सम्मिलित है।


क्या सच में कबीर दास पढ़े-लिखे नहीं थे?
कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे यह सत्य है मग़र जीवन के अनुभवों से उन्होंने बहुत कुछ सिखा। अपनी कविताओं को वे अपने शिष्यों को सुनाते थे और उनके शिष्य उन्हें लिख देते, इसलिए उनकी कविताओं को कबीर-वाणी (कबीर का कहा हुआ) कहा जाता है।


इन्हीं वाणियों का संग्रह ” बीजक ” नाम के ग्रंथ में किया गया है, जिसके तीन मुख्य भाग हैं - 'साखी', 'सबद (पद )' और 'रमैनी'। 



हम इन्हें ऐसे संत के रूप में पहचानते हैं जिन्होंने हर धर्म, हर वर्ग के लिए अनमोल सीख दिए हैं, जिनमें से उनकी सबसे बड़ी सीख थी ‘गुरु के लिए सम्मान’ की!


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आईये पढ़ते हैं गुरु के लिए लिखे संत कबीर के सबसे मशहूर दोहे और उनकी व्याख्या –

"गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।" 

[गुरू और गोबिंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।] 



"गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।
गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।।" 

[कबीर दास कहते हैं – हे सांसरिक प्राणियों। बिना गुरू के ज्ञान का मिलना असम्भव है। तब तक मनुष्य अज्ञान रूपी अंधकार में भटकता हुआ मायारूपी सांसारिक बन्धनों मे जकड़ा रहता है जब तक कि गुरू की कृपा प्राप्त नहीं होती। मोक्ष रूपी मार्ग दिखलाने वाले गुरू हैं। बिना गुरू के सत्य एवं असत्य का ज्ञान नहीं होता। उचित और अनुचित के भेद का ज्ञान नहीं होता फिर मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? अतः गुरू की शरण में जाओ। गुरू ही सच्ची राह दिखाएंगे।] 



"गुरू पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत।
  वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।।" 

[गुरू और पारस के अन्तर को सभी ज्ञानी पुरूष जानते हैं। पारस मणि के विषय जग विख्यात हैं कि उसके स्पर्श से लोहा सोने का बन जाता है किन्तु गुरू भी इतने महान हैं कि अपने गुण ज्ञान में ढालकर शिष्य को अपने जैसा ही महान बना लेते हैं।] 



आपकी सबसे पसंदीदा कबीर-वाणी कौनसी है, क्या आपको यह लिखा पसंद आया। 
हमें कमेंट में लिखकर ज़रूर बताएं!

 

Monday, August 12, 2024

पीतल को सोना बताकर बेचने को क्या कहेंगे? फ्राड? बेईमानी, चोरी?

पीतल को सोना बताकर बेचने को क्या कहेंगे? 
फ्राड? बेईमानी, चोरी? 

10 रु की चीज को दस करोड़ का बताकर, बैंक में गिरवी रखके, करोड़ो कर्ज लेने वाले को क्या कहेंगे? 

हिंडनबर्ग यही बता रहा है। 
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जब शेयर मार्केट में किसी शेयर के दाम नकली रूप से बढ़ाये जाते है, तो आम इन्वेस्टर के फायदे के लिए नही बढ़ाये जाते। 

क्योकि कम्पनी के 25 शेयर मार्केट में है, तो 75 मालिक के पास। अगर बाजार में 25 शेयर का मूल्य सौ गुना हो जाये, तो 75 शेयर का मूल्य भी सौ गुना हो जायेगा। 

तो प्राइज बढ़ने से इन्वेस्टर की कम, मालिक की वेल्थ ज्यादा बढ़ती है। 
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यह वेल्थ है- शेयर
और ये शेयर है- महज एक कागज

जो कल बाजार में 10 रु का था, आज 10 करोड़ का दिख रहा है। तो मालिक अपने शेयर गिरवी रखकर, 10 करोड़ के असली नोट उठा सकते हैं। 

तो ये यह हुआ, पीतल को सोना बताकर बेचने का फ्रॉड। 
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और इस फ्रॉड को पकड़ कर, सजा दिलाने की जिम्मेदारी जिस संस्था की थी, उसकी कर्ता धर्ता खुद ही इस फ्रॉड में शामिल है.. 

जो फंड इन शेयरों की कीमत नकली रूप से बढा रहा था, उस फंड में इनका भी पैसा लगा है। 
यह बात हिण्डन बर्ग की नई रिपोर्ट कह रही है। 
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हिंडनबर्ग अपनी रिपोर्ट, पब्लिक डोमेन में मौजूद दस्तावेजों की पड़ताल करके देता है।

याने जो रिपोर्ट कम्पनियां खुद ROC के देते है। वेबसाइट में डालते है, या अन्य फर्मों से आदान प्रदान करते हैं। 

ऐसे में उसके आंकड़े अकाट्य है। कम्पनियों द्वारा स्व-स्वीकार्य हैं। उसकी रिपोर्ट के डिनायल का मतलब यह है कि वो खुद ही अपनी रिपोर्ट डिनाय कर रहे हैं। 
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हिन्डनबर्ग से बचाव के लिए इसके खिलाफ बोली जाने वाली मूर्खतापूर्ण बाते कुछ इस तरह की हैं...

1- यह विदेशी संस्था है। अमेरिकी है, सीआईए है, एलियन है, दुष्ट भारत से जलता है। 

जवाब- उस सब मान लिया। आंकड़े सच है, या झूठ, आप वो बताओ। सच, देशी या विदेशी नही होता। 

और अगर झूठ है, तो कम्पनी खुद झूठ बोल रही है। आखिर उसी के आंकड़े, और जानकारी तो कोट की जा रही है। 

2- हिन्दनबर्ग ऐसी रिपोर्ट के बाद शार्ट सेल करता है, पैसे कमाता है। 

जवाब- स्मगलिंग की सूचना देकर माल पकड़वाने वाले को 10% इनाम मिलता है। अब सूचना देने वाला इनाम के लालच में करता है, या देशप्रेम से ओत प्रोत होकर, यह बात बकवास है।

पुलिस को अब स्मगलर को पकड़ना चाहिए , की सूचना देने वाले को ही लालची होने का इल्जाम लगाकर खारिज कर दोगे?? 

2- ये देश की अर्थव्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश है। 

जवाब -ये बात 100% सच है। अडानी इज इंडिया, इंडिया इज अडानी। उसके शेयर गिरने से देश एकदम बर्बाद हो जाएगा। 

क्योकि वह जबरन शेयर के दाम बढ़ाकर, बढ़े दाम पर गिरवी रख के, अरबो करोड़ लोन लेता है, इसी से तो हमारी अर्थव्यवस्था चल रही है। 

वर्ना बाकी तो भड्ड है। कर्जा आकाश पर खड़ा है, रुपया पाताल में। बस अडानी ही अर्थव्यवस्था है। देश के बाकी 140 करोड़ नागरिक, लाखो फैक्ट्री, व्यापारी, कर्मचारी और 10 लाख कम्पनियां तो बस घुइयां छील रही हैं। 
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जो लोग बात बात पर कहते है, की फलाना खदान बिक रही है, खरीद लो, वरना न कहना कि अडानी ने खरीद लिया.. 

उनसे अनुरोध है कि पीतल जैसे शेयर को सोना बताकर, गिरवी रखवाकर दो चार लाख करोड़ का असली नोट मुझे भी दिलवा दो। सेबी से संरक्षण भी दिलवा दो। 

फिर रेल, भेल, तेल, जेल सब खरीद लूंगा, और तुमको एक हजार करोड़ कमीशन भी दे दूंगा। 
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दरअसल मोदी और हिंदुत्व की रक्षा करते करते ये बनबूचड़ों की जमात, कब अडानी के पन्ना प्रमुख बन गए, इन्हें पता ही न चला। 

देश के प्रमुख पदों पर चाटुकार, बेईमान, इंकम्पेटेंट और धूर्त लोग बिठाये गए हैं। एक अलग ही धूर्त लोक बना दिया गया है, जो आपस एक दूसरे के काले कारनामो का पालन पोषण करते हैं। 

और भाजपा-आरएसएस, ट्रोल और तमाम इनके टूलकिट, इस धूर्तलोक के सुरक्षाकर्मी बन गए हैं।
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क्या केशव बलिराम हेडगेवार ने सोचा होगा, कि वो सारा मन्त्र, यंत्र और तंत्र जो बना रहे हैं, वह सौ साल बाद बस, एक आदमी की गुलामी कर जेब भरने का सिस्टम बन जायेगा। 

और वो सावरकर, जो 60 रुपये के लिए पूरी नेकनामी मिट्टी में मिला लिए। सोने के भाव पीतल बेचने वाले को देख कब्र में कितना उलटते पुलटते होंगे। 

क्योकि ये दो चेहरे, आरएसएस नाम के वृक्ष का सबसे मीठा फल हैं। 

🤔

Friday, August 2, 2024

जाति जनगणना मेरी नज़र में जरूरी क्यों?

जाति जनगणना के कई लाभ, नुकसान नगण्य। 
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1. हमारे समाज में जाति और हरेक जाति के आंकड़े/स्थिति से जुड़े कई तरह के भ्रम विद्यमान हैं। उनके टूटने के लिए जातिवार जनगणना जरूरी है। संख्या के साथ उनकी स्थिति का पता होने से असल में वचिंत और कमजोर जातियों को बेहतर सुविधा व योजनाओं का त्वरित लाभ सही अनुपात में दिलाया जा सकता है। 

2. आबादी के अनुपात में सबको समुचित अवसर मिलना ही 'समाजवादी लोकतंत्र' का मूल मकसद है। अनुसूचित जाति, भारत की जनसंख्या में 15 प्रतिशत हैं और अनुसूचित जनजाति 7.5 प्रतिशत हैं। सरकारी नौकरियों, स्कूल, कॉलेज तथा विविध चुनावों में उनको आरक्षण इसी अनुपात में मिलता है। 

3. वहीं, जनसंख्या में ओबीसी और सवर्ण की हिस्सेदारी कितनी है, इसका कोई ठोस आकलन/आंकड़ा नहीं है। 1993 में आये सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक, कुल मिला कर 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता, इस वजह से 50 प्रतिशत में से अनुसूचित जाति और जनजाति के संख्यानुपतिक आरक्षण को निकाल कर बाकी का 27 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी के खाते में डाल दिया गया। इसके अलावा ओबीसी को मात्र 27 प्रतिशत आरक्षण का देने का कोई आधार नहीं है।

4. ऐसे में कुछ सवाल बने रह जाते हैं। पहला यह कि ओबीसी की सही आबादी है कितनी? कहीं ओबीसी को संख्या के अनुपात से ज्यादा या कम आरक्षण तो नहीं मिल रहा है? यदि संख्या से ज्यादा आरक्षण मिल रहा है, तो उसे कम किये जाने की जरूरत है, वहीं यदि संख्यानुपात में कम है, तो इस गैरबराबरी को खत्म करने के लिए आरक्षण बढ़ाने की जरूरत है। चूंकि, आठ लाख की पारिवारिक आय वाली गरीबी को आधार बना कर बिना किसी गणना के सवर्णों को दिये 10 प्रतिशत आरक्षण की वजह से आरक्षण का दायरा अब 60 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, तो सही आंकड़े आने पर इसमें कानूनी तौर पर बदलाव भी संभव है। इससे सुप्रीम कोर्ट के मनमाने फैसलों को तथ्यात्मक रूप से चुनौती दी जा सकती है। 

5. एक मुद्दा यह उठता रहता है कि ओबीसी के आरक्षण का सबसे ज्यादा लाभ तीन-चार प्रमुख जातियों ने ही उठाया है। इनमें उत्तर भारत की तीन प्रमुख ओबीसी जाति यादव, कुर्मी और कुशवाहा जाति के नाम आते हैं। ऐसे में जाति जनगणना से पहले तो यह पता चल पायेगा कि क्या 1993 से लेकर अब तक सरकारी नौकरियों में ओबीसी हिस्सेदारी 27 फीसदी तक भी पूरी हो पायी है या नहीं? यदि पूरी हो भी गयी है, तो क्या सचमुच बड़े हिस्से का लाभ इन्हीं कुछ ही जातियों ने उठाया है? इन जातियों की संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की क्या स्थिति है?

6. ओबीसी जातियों की संख्या और प्रतिनिधित्व के आंकड़े के आधार पर ओबीसी और इबीसी के आरक्षण अनुपात को घटाया/बढ़ाया जा सकता है। रोहिणी आयोग की रिपोर्ट को भी लागू किया जा सकता है। 

7. समाज में अभी तक मुंहजोरों का बोलवाला रहा है, क्योंकि असल में कौन कितने पानी में है, यह पता ही नहीं है। फलाने की आबादी कितनी है, सब जाति जनगणना से पता चल जायेगा। नहीं तो अभी वही स्थिति है कि जैसे- हट्टा-कट्टा श्रम करने वाला मजदूर भी थुलथुले मालिक से खुद को कमजोर मानता है। इसी तरह कई तथाकथित कमजोर जातियां अपनी संख्या को जानती ही नहीं है और यह मान कर कि हम तो कम होंगे, न चुनाव लड़ते हैं, न ही दलों के पास टिकट की दावेदारी करते हैं।

8. रही जातिगत विभेद के बढ़ने की बात तो वह पहले से विद्यमान है और उसे हिंदुत्व वे ऑफ लाइफ के रहते खत्म नहीं किया जा सकता। क्योंकि, इस धर्म में पुजारी बनने की योग्यता/प्रक्रिया शिक्षा न होकर जाति है, इसीलिए महान बनने की कोशिश में अपना बहुमूल्य समय नष्ट न करें।

9. बहुसंख्य दलित/ओबीसी जातियों के लोग भेदभाव से बचने के लिए बच्चों के नाम में सवर्णों जैसे सरनेम जोड़ देते हैं। उन्हें आरक्षण का लाभ उठाने से ज्यादा जातिगत भेदभाव वाली व्यवस्था के शिकार हो जाने का भय होता है। अधिकांशतः जिनके सरनेम को देख जाति का कंफ्यूजन हो, वे पिछड़े-दलित वर्ग के होंगे। यही भय उनके तरक्की का काल है, क्योंकि कोई भी जाति से छोटा-बड़ा नहीं होता। छोटे-बड़े लोगों के सोच होते हैं। जरूरत है कि सोच को बड़ा करते हुए अपनी पहचान की गणना करवाइये। 

10. जैसे मेरी जाति कुशवाहा है, यह कहने के लिए मुझे लम्बा समय लग गया, लेकिन यह कहते हुए न तो मुझे कोई दुख है और न ही कोई गर्व। समाज की जो बुनावट है, उसमें से एक जाति में संयोग से मेरा जन्म हुआ। सभी पिछड़ी-दलित जाति के लोग आराम से सवर्णों के सरनेम की तरह अपनी जाति का सरनेम बिना जातिवादी कहलाये लगा सकें, इसके लिए जाति आधारित जनगणना जरूरी है।

और... जिन्हें लगता है कि वे जात-पात से ऊपर उठ चुके हैं, वे जाति वाले कॉलम में नोटा दबा दें। 

बाकी त जे है से हइये है!

एससी-एसटी आरक्षण में कोटे में कोटा का क्या मतलब है? क्या ये सही है भी या नहीं?


कुछ बहुत सिंपल सी बात लोग नहीं समझ पाते। क्योंकि उन्हें उन्ही के वर्ग के लोग गुमराह कर देते हैं। जैसे एससी-एसटी आरक्षण में कोटे में कोटा। यहां यह बात समझनी होगी कि आरक्षण को खत्म या फिर किसी और को नहीं दिया जा रहा, यहां एससी-एसटी वर्ग के ही उन लोगों को नेतृत्व दिया जा रहा जो तमाम कोशिशों के बाद भी मुख्यधारा में नहीं आ पाए। 

अभी जैसे करीब एससी-एसटी के लिए 23% आरक्षण है। इसमें जाति को लेकर किसी तरह का वर्गीकरण नहीं है। अब होगा यह कि इसमें सरोज, जाटव, मीणा, धोबी जैसी जातियों के कोटे निर्धारित हो जाएंगे। फिर हमें यह देखने को नहीं मिलेगा कि एक परीक्षा में एससी-एसटी कोटे से सिर्फ मीणा या फिर जाटव ही नजर आ रहे। सब नजर आएंगे। सबकी स्थिति बेहतर होगी। 

कुछ लोग कहते हैं कि आरक्षण जाति के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक भेदभाव पर दिया गया है। हां यह सही बात है लेकिन सामाजिक भेदभाव जब तक खत्म नहीं होगा क्या उन्हीं परिवारों को लाभ मिलता रहेगा जो चार-चार पीढ़ियों से आरक्षण के चलते सिस्टम में हैं। उनके पास घर-गाड़ी, बंगला है। 

दलित वर्ग के शिक्षित और सफल लोगों को अपने समुदाय के लोगों की फिक्र करनी चाहिए थी लेकिन वह सिर्फ जातीय पहचान को बढ़ावा देने और उसे बनाए रखने के लिए फिक्रमंद दिखते हैं। आप अपने गांव में देखिए, जो संपन्न हो गए हैं वह अपने ही वर्ग के लोगों का अपमान करने का मौका नहीं छोड़ते। आर्थिक मजबूती से उनके अंदर एक समांती सोच घर कर जाती है। 

आप सबको ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन करना चाहिए। इसके लागू होने से दलित वर्ग की बाकी जातियों को लाभ होगा। अगर आपको लगता है कि दूसरे योग्य नहीं हैं तो आप बताएं कैसे योग्य होंगे? मौका मिलेगा तभी तो होंगे न! आप तो अपने ही भाई बंधुओं को मौका नहीं देना चाहते।

बाबा साहेब अम्बेडकर आज होते तो वह भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जताते।

_✍️ Rajesh Sahu

Wednesday, July 17, 2024

साँप को कैसे पहचानें? साँप के काटने पर क्या करें क्या ना करें?



🟢सांप काट ले तो तुरंत करें उसका उपचार, इन गलतियों से बचें। 

🟢कैसे पहचाने कि सांप जहरीला है या नहीं ?

🟢इस जानकारी को सेव कर ले और दूसरों तक शेयर करें, बरसात के मौसम में सांप काटने से जाने वाली जान इस सही जानकारी से बचाई जा सकती है I

सांप काटने पर सबसे जरूरी है कि उसके लक्षणों की पहचान कर उसका तुरंत उपचार करना।आजआपको बताएंगे कि यदि सांप काट ले तो क्या करेंऔर क्या ना करें। 👇👇 

🟢सांप के काटने पर क्या करें :

1.तुरंत एंबुलेंस को कॉल करें 
2.व्यक्ति को सांप से दूर ले जाएं।
3.यदि घाव दिल के नीचे है तो व्यक्ति को लिटा दें।
4.व्यक्ति को शांत और आरामपूर्वक से रखें और जहर को फैलाने के लिए जितना संभव हो सके व्यक्ति को स्थिर रखें।
5.घाव को ढीली और साफ पट्टी से कवर करें।
6.प्रभावित हिस्से से किसी भी गहने या टाइट कपड़े को हटा दें।
7.यदि सांप ने पैर पर काटा है तो जूतों को निकाल दें।
9.सांप के काटने के समय का ध्यान रखें।

🟢क्या न करें:

1.डॉ द्वारा निर्देशित किए जाने तक व्यक्ति को कोई दवा न दें।
2.यदि सांप के काटने का घाव व्यक्ति के दिल से ऊपर की ओर है
घाव को न काटें
3.जहर को बाहर चूसने का प्रयास न करें
4.घाव पर ठंडे संपीड़न, बर्फका प्रयोग न करें।
5.व्यक्ति को अल्कोहल या कैफीनयुक्त पेय न दें
6.पीड़ित को चलने न दें। उन्हें वाहन से ले कर जाएं।
7. सांप को मारने या पकड़ने का प्रयास न करें। यदि सम्भव हो तो सांप की तस्वीर ले। 
8.किसी भी पंप सक्शन डिवाइस का उपयोग न करें।

🟢सांप के काटने के लक्षण क्या हैं?
उल्टी ,शॉक ,अकड़न या कंपकंपी एलर्जी 
पलकों का गिरना ,घाव के चारों ओर सूजन, जलन और लाल होना 
त्वचा के रंग में बदलाव ,दस्त बुखार पेट दर्द ,सिरदर्द जी मिचलाना 
लकवा मारना ,पल्स (नब्ज) तेज होना ,थकान मांसपेशियों की कमजोरी ,प्यास लगना, लो BP

🟢कैसे पहचाने कि विषैला है या नहीं ?

भारत में सांपों की 250 प्रजातियां हैं, जिनमें से 4 सबसे अधिक घातक हैं। 
*कॉमन कोबरा (नाग ), 
*सॉ-स्केल्ड वाइपर, 
*कॉमन क्रेट और 
*रसेल वाइपर। 

1.जहरीले सांप का शीर्ष बहुत विशाल(त्रिकोण)होता है जबकि गैर जहरीले सांप का शीर्ष सामान्य होता है। (जैसा नीचे फोटो में दिखाया गया है )

2.आमतौर पर 2 दांत के निशान जहरीले सांप के होते हैं और छोटे-छोटे बहुत सारे निशान गैर जहरीले सांप के। 

Note:- स्वास्थ संबंधित जानकारी के लिए X पर फॉलो करें 
@drvikas1111  पोस्ट को रिट्वीट करें ताकि सही जानकारी से उनकी जान बचाई जा सके। 

🟢सांप काटने पर फर्स्ट ऐड -
सांप काटने की जगह को साबुन और पानी से धोना चाहिए ,साथ ही उस पर साफ/स्टाइल कपड़े से ड्रेसिंग कर सकते हैं। 

सांप काटने की जगह को ऊपर से बांध सकते हैं परंतु ,ज्यादा जोर से बांधने पर पैर/हाथ की ब्लड सप्लाई रुक जाता है और पैर/हाथ काटने की नौबत आ जाती है। #HealthTips #snake

राहुल के बुरे दिन कैसे शुरू हुए??

राहुल के बुरे दिन कैसे शुरू हुए?? 

शुरू हुए भट्टा परसौल से। किसानों की जमीन सरकारी प्रोजेक्ट के लिए लेने, और उचित मुआवजा न मिलने की समस्या को लेकर वे किसानों से मिलने जाना चाहते थे। 

यूपी सरकार ने रोका, तो वे नाटकीय तऱीके से मोटरसायकिल में बैठकर चले गए। यह पहली गलती थी। 
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दूसरी गलती थी, उड़ीसा में नियमगिरी का दौरा। यहां उन्होंने अपना फेमस जुमला बोला- आई एम योर सोल्जर एट डेल्ही.. 

राहुल, गरीबो का सिपाही बनने की कोशिश कर रहे थे। यह अच्छी बात तो नही थी। 

गरीबो का सिपाही बनने के लिए आपको अमीरों के किले पर चढ़ाई करनी पड़ेगी। और अमीर जब आपका मित्र ही हो, तो चढ़ाई क्यो करना?? 

क्योकि नियमगिरी और भट्टा परसौल के बाद भू अधिग्रहण क़ानून आया। किसानों को जमीन के चौगुने मोल मिले,लेकिन अमीरों के प्रोजेक्टों की कॉस्ट तो चौगुनी हो गई। यह कीमत मुनाफे में छेद करती है। नुकसान देती है। 

आखिर यह दुश्मनी क्यो निकाली राहुल ने?? 
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यूपीए-2 सरकार भी अपने पैरों पर जमकर कुल्हाड़ी मार रही थी। और उसमे आगे आगे थे- जयराम रमेश। 

वे पर्यावरण मंत्री थे। 

अब मंत्री को लालबत्ती कार लेनी चाहिए, बंगले में रहना चाहिए। चुपचाप फीते काटने चाहिए और नोट लेकर, नोटशीट पर दस्तखत करने चाहिए। पर मंत्रीजी एआईए- एसआईए स्टडी को पढ़ने लगे

जयराम रमेश ने अपना जॉब सीरियसली ले लिया। पर्यावरणीय मानकों पर सैंकड़ो प्रोजेक्ट रद्द किए, खारिज किया, फच्चर फंसा दिया। धनपशुओं के अरबो अधर में लटक गए।  

अब हाथियों के कॉरिडोर के लिए, माइंस प्रोजेक्ट को रोकने का काम, कोई बुद्धिमान नेता रोकता है क्या?? 

जिस देश मे अक्ल से बड़ी भैंस होती है, वहां हाथी बड़ा या उद्योगपति? आप बताओ। 
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एक के बाद ऐसे कई मामले हुए, और सरकार अमीर विरोधी सरकार बन गयी। 

लेकिन अमीरों के हाथ, सरकार से भी लम्बे होते है। और चैनल उनमे से एक होता है। 

देश के 30 में से 18 चैनल उसी के थे, जिसके लड़के के ब्याह में रिहन्ना नाचती है। लिहाजा सारे चैनल सुर बदलने लगे। 

जो घोटाले, पांच सात साल बाद, कोर्ट खारिज करने वाला था, उनका तुरत फुरत मीडिया ट्रायल चला। चैनल के पर्दे पर आपकी अदालत लगी। एंकरों ने मनमोहन सरकार को, टीवी पर दोषी करार दे दिया। 
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एक कंगारु कोर्ट रामलीला मैदान में भी लगाई गई। टीवी ने उसे 60-60 घण्टे का अनब्रोकन कवरेज दिया। इन कोशिशों से एकाएक, हवा बदलने लगी। 

दरअसल तूफान पैदा हो गया। 

जो बड़े बड़े पंखे लगाकर पैदा किया गया था। इन पंखों का कनेक्शन उन्ही घरानों से जुड़ा था, जिनके ब्याह में जस्टिन बीबर नाचता है। 
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सरकार बदली, और फिर उसी मीडिया ने पप्पूकरण शुरू किया। टीवी और सोशल मीडिया पर 5 साल, एकतरफा नरेटिव चला। 

पप्पू, पप्पू, पप्पू...

राहुल फिर भी लड़े। भीतर लड़े, बाहर लड़े, लेकिन अकेले। न कांग्रेस साथ थी, न जनता, न मीडिया, न सिस्टम। उस पर बीच चुनाव बालाकोट का ड्रामा। 

यूँ समझिये, 2019 में अभिमन्यु को घेरकर मारा गया। जो सरकार बदलनी चाहिए थी, मजबूत होकर लौटी। 

राहुल भी महज 8 सीटें बढ़ा सके। 
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इस्तीफे, और साल दो साल की उहापोह के बाद राहुल ने फिर सर उठाया। वह किया, जो पहले नही किया था। 

जनता से जुड़े। जो शब्दो से कह पाने में सफल न हुए, देहभाषा बोल गई। अब उसकी आंखें बोलती है, बदन बोलता है, देश सुनता है। 

समझता भी है। 
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पप्पू करण का वह दौर गुजर चुका है। राहुल मिट्टी पकड़ पहलवान की तरह अखाड़े में डटे हैं। पहले से कहीं ज्यादा मुखर, चमकदार, ताकतवर, निर्भय नजर आते हैं। 

लेकिन अंदाज वही अक्खड़ है। वे खेत मे दिख जाएंगे, नाई की दुकान में, किसी बढई या मिस्त्री की वर्कशाप में दिख जाएंगे, सड़को पर चलते दिख जाएंगे...

लेकिन आज भी यह बन्दा, उस ब्याह में नही दिखता जहां देश का सारा पोलिटीकल क्लास नाचता है। 
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यह तब जब सबसे बड़ा उद्योगपति, खुद न्योता लेकर दस जनपथ पहुँचा। राहुल नही मिले, वे भगदड़ में मरे लोगो को सांत्वना देने चले गए। मणिपुर चले गए। गुजरात चले गए। 

एंटीलिया में हाजिरी नही दी, 
सर न झुकाया। 

इस जिद्दी लड़के के इसी अंदाज का कायल हूँ। अब भले ही इसी अंदाज ने जिसने पंद्रह साल पहले, कांग्रेस का, राहुल का, देश का सितारा डुबोया था। 
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पर अच्छा लगता है, कि तमाम झँजवात में गिरने, बिखरने, टूटने के बावजूद भी कोई है जो डरा नही है, डिगा नही, बदला नही है। 

वो आज भी अड़ा है.. 
वहीं खड़ा है। 

भट्टा परसौल के किसानों से घिरा, नियमगिरी के आदिवासियों के बीच उस मंच पर, जहां से आती हुई आवाज, वैसी की वैसी रवानियत के साथ, कानो में गूंज रही है.. 

आई एम योर सोल्जर एट डेल्ही.. 
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और मैं कहता हूँ...बी देयर माई बॉय, 

योर एरा हैज कम...


लेखक कर्ता है आपका

Monday, July 15, 2024

आपको पता है अमेरिका में राष्ट्रपति की हत्या कब-कब हुई?

Photo : Convey of John f Kennedy

आपको बता दे कि अमेरिका में कब-कब राष्ट्रपति की हत्या कर दी गई? 

* 1865 में तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की हत्या कर दी गयी.
* 1881 में तत्कालीन राष्ट्रपति जेम्स गारफील्ड की हत्या कर दी गयी.
* 1901 में तत्कालीन राष्ट्रपति विलियम मैककिंली की हत्या कर दी गयी.

इस हत्या के बाद अमेरिका की संसद (Congress) ने सीक्रेट सर्विस एजेंसी से अमेरिका के राष्ट्रपति को सुरक्षा मुहैया कराने का जिम्मा सौंपा.

1902 में सीक्रेट सर्विस एजेंट्स ने अमेरिकी राष्ट्रपति को सुरक्षा देना शुरू कर दिया.

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तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने 14 अप्रैल 1865 में अपनी मौत से कुछ घण्टे पहले सीक्रेट सर्विस एजेंसी की स्थापना के अध्यादेश पर हस्ताक्षर किया था.

लेकिन सीक्रेट सर्विस की स्थापना सुरक्षा के लिए नही, जाली नोटों के कारोबार पर नकेल कसने के लिए की गई थी.

सीक्रेट सर्विस एजेंसी को ज्यादा अधिकारी दिया गया. हत्या, बैंक रॉबरी और गैरकानूनी जुआ की जांच करने के अलावा आंतरिक खुफिया एजेंसी का भी दायित्व सौंपा गया.

1908 में FBI की स्थापना के बाद सीक्रेट सर्विस एजेंसी ने अपना पूरा ध्यान राष्ट्रपति की सुरक्षा व्यवस्था में केंद्रित किया.

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1963 में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी पहले राष्ट्रपति थे जिनकी हत्या सीक्रेट सर्विस एजेंट्स की सुरक्षा व्यवस्था में हुई.

डल्लास शहर के दौरे पर पहुंचते ही सीक्रेट सर्विस एजेंट्स ने राष्ट्रपति के लिमोजीन कार की छत को बंद रखा था.

हज़ारों लोग सड़कों पर कई घण्टों से राष्ट्रपति की एक झलक देखने के लिए खड़े थे. जॉन एफ कैनेडी ने जनता का अभिवादन स्वीकार करने के लिए लिमोजीन कार की छत को खुला कर करवा दिया.

सुरक्षा व्यवस्था में यह सबसे बड़ी चूक साबित हुई.

जॉन एफ कैनेडी के सिर में गोली मार दी गयी. उनकी पत्नी घबरा गयीं वो चीखने चिल्लाने लगीं 

पीछे के काफिले में चल रही सीक्रेट सर्विस एजेंट्स की कार से क्लिंट हिल नाम के सीक्रेट सर्विस एजेंट्स ने बहादुरी का परिचय देते हुए राष्ट्रपति की चलती कार पर कूद कर राष्ट्रपति की पत्नी को कवर किया.

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जॉन एफ कैनेडी की हत्या के बाद सीक्रेट सर्विस सुरक्षा में किसी भी राष्ट्रपति या भूतपूर्व राष्ट्रपति की जान नही गयी.

लेकिन हत्या करने की नाकाम कोशिश जरूर हुई.

1912 में तत्कालीन राष्ट्रपति थिओडोर रूसेवलेट पर जानलेवा हमला हुआ. 

1981 में तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन पर जानलेवा हमला हुआ. 

2024 में भूतपूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर हमला हुआ.

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1968 में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे रोबर्ट एफ कैनेडी की हत्या कर दी गई.

इस हत्या के बाद सीक्रेट सर्विस एजेंसी को राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे सभी उम्मीदवारों को सुरक्षा देने का दायित्व सौंपा गया.

सीक्रेट सर्विस एजेंसी सिटींग राष्ट्रपति, उनका परिवार और भूतपूर्व राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को आजीवन सुरक्षा मुहैया कराती है.

आप लोगों को जानकारी कैसे लगी कमेंट बॉक्स में बताएं.


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Thursday, July 11, 2024

ज़िंदगी हो तो पूजा खेड़कर जैसी! क्या आप जानते हैं पूजा खेड़कर कौन है?

ज़िंदगी हो तो पूजा खेड़कर जैसी! 
क्या आप जानते हैं पूजा खेड़कर कौन है? यदि नहीं जानते तो चिंता करने की कौई बात नहीं। मैं बताता हूं आपको पूजा खेड़कर कौन है और वो चर्चा में क्यों है? 
दर असल आप जानते हैं कि यूपीएससी क्रैक करने अपने आप में कितना कठीन है और इसमें डॉक्यूमेंट की जाँच प्रक्रिया भी कठिन है। यूपीएससी होने के बाद भी IAS मिलेगा या नहीं ये भी चिंता का विषय होता है। 
OBC, SC, ST, EWS, PWD आदि जैसे वर्गों के लिए कुछ सीट आरक्षित होता है जिसके वजह से थोड़ा बहुत कम NO. होने पर भी अच्छा रैंक आ जाता है, उसके बाद उसके डॉक्युमेंट्स, PHYSICAL CONDITIONS देख कर CANDIDATE के IFS, IAS, IPS, IRS जैसे पदों के लिए चुना जाता है। 

अब आते हैं पूजा खेड़कर पर की वो चर्चा में क्यूं है? 
* दरअसल उसका UPSC में रैंक 821 आया मगर IAS मांगता मैं और लिया भी।
* ट्रेनी IAS अफ़सर पूजा के पैरेंट्स के पास संपत्ति 40 करोड़ 
 110 एकड़ कृषि भूमि, 6 दुकानें , 7 फ्लैट, 900 ग्राम सोना, हीरे, 17 लाख रुपये 
  की सोने की घड़ी, 4 कारों के साथ दो प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों में हिस्सेदारी है। 
  मगर अपुन नॉन-क्रीमी लेयर में आता है।  
* ट्रेनी IAS हैं मगर मुझे अपने सीनियर का ऑफिस कब्जाना है और कब्जाया भी।
* अपुन Audi पर नीली बत्ती लाल बत्ती मांगता है, गाड़ी का VIP नम्बर मांगता है और मिला भी।
* दरअसल पूजा खेड़कर अब तक मात्र अपने नख़रीले अंदाज़ के कारण चर्चा में थीं 
  और उनका ट्रांसफर हो गया था मगर अब सामने आया है कि इन्होंने दिव्यांग 
  कैटेगरी से सलेक्शन लिया और 821 रैंक के बाबजूद IAS बनी। 
* इन्हें UPSC ने छह बार मेडिकल टेस्ट के लिए बुलाया मगर ये नहीं गईं।


Sunday, July 7, 2024

क्या सच में लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति जैसे सम्मानित पदों पर ऐसे सवाल उठना वाकई में चिंता का विषय है?

राजदीप सरदेसाई जी ने अपने YouTube चैनल पर ओम बिरला जी और जगदीप धनकड़ जी को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि 

"लोकसभा में ओम बिरला जी और राज्यसभा में जगदीप धनकड़ जी दोनों ही लोग एकदम से Biased हैं, यह दोनों ही लोग अपने पद के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। यह दोनों ही लोग वन साइडेड हैं।"

उन्होंने आगे यह भी कहा कि 

"राज्यसभा में तो TV की स्क्रीन पर जगदीप धनकड़ साहब ही दिखाई देते रहते हैं।"

दरअसल लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति का पद बेहद ही सम्मानित होता है और इसकी एक गरिमा भी होती है मगर 

अब इन पदों पर ऐसे सवाल उठना वाकई में चिंता का विषय है।

Source: Jaiky Yadav

Wednesday, July 3, 2024

राहुल गांधी का बालक बुद्धि इतना विकराल होगा? बालकबुद्धि है तब ये हाल है कि एक भाषण में 12 बार पानी पिलाया।


बालकबुद्धि है तब ये हाल है कि एक भाषण में 12 बार पानी पिलाया। 

वही बालकबुद्धि जब संसद में बोल रहा था तो खुद प्रधानमंत्री दो-दो बार खड़े हुए। पांच-पांच मंत्री लगे थे मिस्टर छुईमुई को बचाने में। और बालकबुद्धि?? 

वही बालकबुद्धि है जिसने तुम्हारा अहंकार तोड़ दिया और 400 पार के नारे का ये हाल हुआ कि नतीजे के बाद न हंस पाए, न रो पाए। 

कार्यकर्ताओं के सामने आए तो जैसे शोकसभा चल रही हो - 

आंख में आंसू, फीकी सी नकली हंसी... एक ही महीने में भूल गए? 

वही बालकबुद्धि है जिससे चुनाव लड़ने के लिए पूरी सरकार उतारनी पड़ती है। हिम्मत है तो पार्टी को पार्टी से चुनाव लड़ने दो! खरीदा हुआ आयोग, खरीदा हुआ मीडिया, सीबीआई, ईडी, आईटी और पूरी सरकार, ऊपर से धार्मिक उन्माद का ज्वार, तब भी न हुआ 250 पार! 

यह मजाक उड़ाना नहीं है। इसे खीज कहते हैं। हार के बाद भानुमती का कुनबा जोड़कर सरकार बनी है। जिन्हें मुस्लिमपरस्त कहा, उन्हीं से गठजोड़, पाखंड की सारी सीमा पार। 

चुनाव में हिंदुओं को भड़का रहे थे कि कांग्रेस मुसलमानों को आरक्षण देगी। अब मुसलमान को आरक्षण देने वाले से गठबंधन? हिंदू अंधा है? उसे दिखता नहीं, तुम्हीं अकेले होशियार हो? 

दस साल तक अरबों फूंक डाले उसी आदमी को पप्पू साबित करने में, सब पानी में गए। अब बालकबुद्धि लॉन्च किया है। यह मजाक उड़ाना उससे भी ज्यादा भारी पड़ेगा। 

 देश ने देखा कि कैसे राष्ट्रपति के अभिभाषण पर आपकी चर्चा उसी बालकबुद्धि पर केंद्रित रही। आपके भाषण का सार यही निकला कि आप कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस छोड़कर कुछ बोल ही नहीं सकते। 

असल में आप डरे हुए हैं इसलिए जब आपको अपने कार्यक्रमों और नीतियों पर बोलना है, तब राहुल गांधी से आतंकित होकर डीरेल हो जाते हैं।