Wednesday, June 12, 2024

भारतीय रेल्वे की ये दुर्दशा! क्या अब वन्दे भारत में भी ऐसा होगा?

क्या सच में अब वन्दे भारत में भी ऐसा होने लगा है?
आप देख कर चौंकिए नहीं ये वही वन्दे भारत के जिसके लिए रेल मंत्री को अपंग बना कर मोदी जी ने झंडा दिखाना शरू किया, जिसका पूरा क्रेडिट मोदी जी ने लिया।

ये अच्छी बात है कि कोई अच्छी लग्जरी ट्रेन भी भारत की पटरी पर दौड़ पाया। इसमें हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए कि भारत में सबसे पहले luxury train "दी पैलेस ओन व्हील्स" 1982 में ही राजस्थान में चली थी जो एक टूरिस्ट ट्रेन थी। 


मग़र-परंतु तो इसके साथ भी होना ही चाहिए। 
इसका फ़ायदा गरीबो को हुआ या अमीरों को?? 
जितना ज्यादा फ़ायदा अमीरों को नहीं मिला उससे ज़्यादा नुकसान गरीबो का हुआ, गरीब औऱ मिडिल क्लास लोग जैसे उसकी बराबरी करने को चाहने लगे वो अपने अस्तर को जनरल से स्लीपर, स्लीपर से ऐसी में जाने लगे तभी सरकार ने वन्दे भारत पर फोकस कर आमिर वर्ग को अपनी और खींचना चाहा, इससे हुआ क्या? गरीब लोगों को यह खुशी मिली कि ऐसा ट्रेन हमारे देश में भी चल रहा है, औऱ ये देखते ही देखते सोशल मीडिया के ज़माने में selfie point में बदल गया और आम लोगों तक सरकार ने समर्थन बटोरा। इसका भाड़ा आम लोगों के जेब से बाहर है ठीक वैसे जैसे Business Man (यानी बड़े restaurant वाले किसी समान का दाम इसप्रकार से रखते हैं जिससे कि आम लोग वहाँ ना पहुँच पाए, पहुंचे भी तो कभी एक बार अपना शौक पूरा करने) इससे धीरे-धीरे आम लोगों और अमीर वर्ग के बीच अपने आप एक रेखा तैयार हो जाता है।

Gagan Pratap ji लिखते हैं X पर
' रेलवे 🤦‍♂️ 
लखनऊ में वंदे भारत पर बिना टिकट यात्रियों का कब्जा। 
आपको बता दें कि यह इस समय भारत की सबसे अच्छी ट्रेन है। 🥺
अगर BEST ट्रेन का ये हाल है तो आप सोच भी नहीं सकते कि बाकी ट्रेनों का क्या हाल होगा😫😫'

[ इसमे कब्जा शब्द का प्रयोग किया गया है, उनको इस विषय पर सोचना चाहिए। 
उनका दुःख भी जायज है कि देश की सबसे अच्छी facility provide करने वाली ट्रेन का यदि ये हाल रहेगा तो अन्य ट्रेन का क्या ही हाल रहेगा।.] 

वन्दे भारत भी कई बार 17-17 घंटे लेट रहता है, फ़िर लोग इतना खर्च क्यूँ करते हैं वो भी इसका फ़ायदा प्राइवेट कंपनी(The Kolkata-based Titagarh Rail Systems Ltd) को मिलता है। 

मैं पूछना चाहता हूं क्या ये ट्रेन भारत सरकार अपने दम पर नहीं चला सकती थी?? 

अब मैं फ़िर वापस आता हूं अपने points पर :-
इसका गरीबो को क्या फ़ायदा मिला? 
*गरीबो का अलग class बना रहेगा जिससे दोनों के बीच असमानता दिखेगा 
*गरीबों का ट्रेन रोक कर वन्दे भारत को निकाला जाता है जिससे पता चलता है कि आम पब्लिक के समय का महत्व नहीं है? 
इसके जगह यदि ऐसा होता कि आम ट्रेन को रोका नहीं जाता और दोनों अपने तय समय में पहुंचता। 
*अच्छे ट्रेन में सुरक्षा कर्मी को रखा जाता है जबकि यह सभी ट्रेनों में रखा जाना चाहिए था? 
*क्या भारत सरकार सभी को सही से बैठ कर जाने का भी प्रबंध नहीं कर सकती है? की आम लोग अपना टिकट ले कर सभी आराम से बैठ कर जा सके। ये सभी को पता है जनरल में लोग luggage रखने के स्थान पर बैठ कर सफ़र करते हैं, और रात को तो नीचे फ़र्श पे, bathroom के बाहर सोता दिखता है। Railway विभाग इसके लिए क्या विचार करती है? 
*सभी ट्रेन में साफ़-सफ़ाई एक तरह होना चाहिए था जनरल ट्रेन में कभी फर्श गन्दा होता है तो कभी toilet, तो कभी पंखा भी नहीं चल रहा होता कभी कभी तो toilet में पानी भी नहीं रखता है। लगता है maintenance ना के बराबर होता है। क्या ये सब train ticket में include नहीं होता है? 
*क्या सभी train में पीने के लिए Railway के द्वारा authorised पानी नहीं मिलना चाहिए? जनरल को तो छोड़िए स्लीपर में भी बाहरी पानी(local water bottle) बेचा जाता है जो कि 10-15 का होना चाहिए तो वो 20 तक वसूलता है। 

कुछ लोग बोलते हैं जनरल में रुपया कम लगता है, कितना अच्छा सुविधा चाहते हो? तो इसपर मैं कहूँगा इसका रेट सरकार तय करती है तो वो हिसाब लगाकर के ही तय करते होंगे। 
[Railway को नियमित रूप से टिकट का जाँच कराना चाहिए इससे Railway को और फ़ायदा हो सकता है।] 
फ़िर मैं वापस आता हूँ आमिर क्लास पर
*जब exam का टिकट आता है तो आप क्या करते हैं? किसमें सफ़र करते हैं? 
*अचानक से तबीयत खराब हो या आपको अचानक से कहीं जाने का निर्णय लेना हो तब आप किसमें सफ़र करने आते हैं? 
*ऐसी sleeper में sheet ना मिले तब आप क्या करते हैं? 
*जब आप दिन का सफ़र कर रहे हों महज 4-5 घंटे का तब क्या आप स्लीपर लेना चाहते हैं? 
*यदि आपको अच्छी शीत, साफ-सफाई अच्छी मिले तो आप तो क्या आप जनरल में सफ़र नहीं करना चाहेंगे? 


इसमे जो भी लिखा गया है वो मेरे आँखों देखा दृश्य से उठता सवाल है? आप भी इसे रोजाना देखते हैं मग़र बोलते नहीं हैं लिखते नहीं हैं। 
बन्दे भारत की तरह इस स्तिथि की वीडियो बनाते नहीं हैं, यदि आप इसे अच्छा करना चाहें तो कर सकते हैं, इसके लिए सभी को आगे आना होगा इसपर बोलना पड़ेगा, लिखना पड़ेगा, इसपर ढेरों vídeo बनाइये और आम लोगों को इसके लिए समझाइए। 




"वंदे भारत की चमचमाती तस्वीरों को तो खूब शेयर करतें हैं @AshwiniVaishnaw जी क्या आपके आईडी में इस तस्वीर को भी थोड़ी जगह मिलेगी..? 

जंक्शन पर तिरंगा झंडा लगा देना विकास का मापक नहीं हो सकता है। देश के नागरिकों को उचित सुविधा देने में भी आप सक्षम नहीं हैं।

रेलवे में रोजगार भी ख़त्म ही कर चूकें हैं। धन्य हो आप जैसा मंत्री हमें फिर से मिला है।"


[जर्मनी की ट्रेन का ये वीडियो देखिए. वहां की जनता भेड़ बकरियों की तरह सफर कर रही है. अब सोचिए हम कितना सुख भोग रहे हैं. हमें वर्ल्ड क्लास सुविधा मिल रही है. सोचते हुए धन्यवाद जरूर कहें.]
इसमें कितने लोग आपको अमीर घर के दिखते हैं?

प्रोफेसर दिलीप मंडल औऱ प्रोफेसर लक्षण यादव क्या एक ही विचारधारा के हैं?


मत बदलना और विचारधारा बदलने में अंतर है.

दिलीप मंडल आरक्षण के समर्थन में हैं. लक्ष्मण यादव आरक्षण के समर्थन में हैं.

दिलीप मंडल जाति जनगणना के समर्थन में हैं. लक्ष्मण यादव भी जाति जनगणना के समर्थन में हैं.

जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी. प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण लागू करना. प्रमोशन में आरक्षण. महिला आरक्षण में OBC आरक्षण लागू करना. कॉरपोरेट लूट, भ्रष्टाचार और जातीय हिंसा - जातीय भेदभाव जैसे अति महत्वपूर्ण मुद्दों पर,

दिलीप मंडल और लक्ष्मण यादव दोनों का विचार समान है.

समस्या कहाँ है ?

मुझे तो कोई समस्या नजर नही आ रही है.

दिलीप मंडल को दोषी क्यों ठहराया जा रहा है ?

जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में OBC SC ST के आरक्षण का मुद्दा उठाना क्या गलत है ?

माइनॉरिटी स्टेटस कानून - OBC SC ST आरक्षण खत्म करने का रोड़ा क्यों होना चाहिए ?

दिलीप मंडल ने नरेंद्र मोदी की तारीफ में दस लाइन कही तो कौन सा आसमान फट गया.

किसी पार्टी या नेता को समर्थन देना या उसके समर्थन में बोलना विचारधारा से समझौता नही होता है.

दिलीप मंडल और लक्षण यादव दोनों अपने मूल विचारधारा पर कायम हैं.

समस्या है नही, फिर क्यों समस्या खड़ी की जा रही है.

फ़ोटो 1 - प्रोफेसर दिलीप मंडल
फ़ोटो 2 - प्रोफेसर लक्षण यादव



मैं दिलीप मंडल के पक्ष में हूं 

मगर उन्होंने समय पर जो मुद्दे उठाना था 

उसे मुद्दे को उन्होंने नहीं उठाया है 

जब चुनाव था तब उन्होंने कुछ ऐसे मुद्दे उठाएं 

जब नहीं उठाना चाहिए था

 जो मुद्दे उठाए हैं इस मुद्दे को चुनाव के बाद भी उठाया जा सकता था

 और इसका निवारण किया जा सकता था

 इसी कारण से कुछ लोग दिलीप मंडल जी का विरोध कर रहे

Tuesday, June 11, 2024

मतलब नही महंगाई से ना ही बेरोजगारी से !!

मतलब नही महंगाई से
बेपरवाह बेरोजगारी से.. 

कभी सोचा आपने, की मोदी सरकार कभी महंगाई और बेरोजगारी को एड्रेस क्यो नही करती?? 

इसके दो पहलू है। 
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पहला- पैसा!!! 

भाजपा, पैसों की लालची पार्टी है। एक दौर में बनियों का दल कहलाने वाले दल की बेसिक तासीर यही है- चुपचाप स्वीकार कर लीजिए। 

पैसा हर मर्ज की दवा है।
और मोदी ब्रांड राजनीति में इसकी जरूरत असीम हैं। 

साल में 5 शानदार चुनाव लड़ने के लिए, मीडिया खरीदने के लिए, होर्डिंग, पोस्टर, पैम्फलेट से देश को पाट देने के लिए, 

सांसद विधायक खरीदने के लिए,
रिजॉर्ट बुक करने के लिए...

बूथ मैनेजमेंट के लिए, रैलियां करने के लिए,
तगड़ा धरना प्रदर्शन करने के लिए, कार्यकर्ताओ की विशाल फौज को लगातार एंगेज्ड रखने को छोटे छोटे कार्यक्रम ऑर्गनाइज करने के लिए...

पैसा एसेंशियल है। 
यह मजदूरी करके नही आता। 
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आरएसएस से लेकर बजरंग दल तक, विवेकानंद फाउंडेशन से लेकर वनबंधु परिषद तक, भाजपा के हजारों आनुषंगिक संगठन हैं।

और जिस मजबूत संगठन के आप कसीदे पढ़ते हैं, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के उन कार्यकर्ताओं का काम, चना फांक कर नही चलता।
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70 साल सत्तावान रही कांग्रेस के पास, आपके शहर में एक किराए की झोपड़ी है। भाजपा के ऑफिस में तीन तल्ले हैं। 

सैंकड़ो कम्यूटर हैं, वर्कर है, डेटा है, कालिंग है, सॉफ्टवेयर है, मोनिटरिंग है, कंसल्टेंट हैं, सर्वे है, कभी खत्म ब होने वाला काम है। 

कांग्रेस के पास बूथ पर वर्कर नही, भाजपा की छतरी हर जगह है। एक बूथ पर एक दिन टीम बिठाने का का खर्च लाख रुपये होना, सस्ता एस्टिमेट हैं। इसमे रात को वोटरों में बंटे पैसे शामिल नही। 
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आईटी सेल है, कम्युनिकेशन प्रोपगेंडा की टीम है, कण्टेट क्रियेटर हैं।

खरीदा और कब्जाया हुआ डेटा है।इलेक्शन कमीशन से जुगाड़े गए, और दवा दुकानों, रेस्ट्रोरेंट की चेन, होटलों, बिग बाजारों में बिलिंग के समय लिखवाए गए आपके फोन नंबर्स हैं। 

आपके धार्मिक-पोर्न- पॉलीटकल ग्रुप में फार्वर्ड भेजने वाले वर्कर हैं।ये वेतनभोगी लोग हैं। 

आपकी पोस्ट पर ट्रोल करने आई फर्जी आईडी को उस कमेंट के लिए महज 2 रुपये मिले। अब सोशल मीडिया पर हर दिन किये गए कमेंट्स का खर्च जोड़िये। 
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कौन देगा इतना पैसा- कारपोरेट
क्यूँ देगा- बिजनेस पाने के लिए

मुनाफे के लिए, कम से कम इन्वेस्टमेंट में ज्यादा से ज्यादा कमाने के लिए। फ्री लैंण्ड, टैक्स छूट, सस्ता कर्ज, कर्ज की माफी पाने के लिए। 

फेयर कॉम्पटीशन के लिए नही, वह मोनोपॉली के लिए पार्टी को पैसे देगा। बैक डोर ठेके के लिए देगा। 2रु की दवा, राशन, कपड़े, कॉमेंटिक्स, सुविधा, सेवा को 200 में बेचने के लिए देगा। 
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सरकार महंगाई कन्ट्रोल करे, तो कारपोरेट का मुनाफा कम होगा। फेयर कम्पटीशन को बढ़ने दे, तो मुनाफा कम होगा। ऑटोमेशन और ठेके की जगह जॉब्स बढाने की पॉलिसी बढ़ाये- कारपोरेट का मुनाफा कम होगा। 

हर वो नीति, हस्तक्षेप, जो जनता की जेब में पैसा बचाएगी, उतना पैसा, उस कारपोरेट की जेब मे जाने से रह जायेग।

यह उसका नुकसान है। इस नुकसान के लिए वह पार्टी को फंड तो करेगा नही। और जिस तरह का "प्रभावी सांगठनिक कौशल" बीजेपी का है, वह फंड के बगैर शून्य है। 

एक बार सोचकर देखिए।

जितने पैसे में कोई दल, पूरे जिले की सब सीटें लड़ लेता है, भाजपा उतना एक सीट पर खर्च करती है। यह सिर्फ इलेक्शन के वक्त दिखा, भाजपा इसे 24X7 बेसिस पर चालू रखती है। 
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सिम्पल ऑब्जर्वेशन है। आपकी आंखों देखी है। लेकिन लोग सोचते नही। 

कायदे से, बढ़ती महंगाई और घटते रोजगार का बेरोजगार का नजला, तो चुनावो में मिलना चाहिए। पर आप वोट बेरोजगारी और महंगाई पर नही देते। 

राम, मुसलमान और पाकिस्तान पर देते हैं।काफी पैसे खर्च कर, आपको सीखा दिया गया है कि सिर्फ रामद्रोही, पाकिस्तानी, और मुसलमान ही भाजपा के खिलाफ हो सकते हैं।

काफी पैसा खर्च कर आपको रटाया गया कि कारपोरेट फंड्स पर सवाल उठाने वाले वामपन्थी हैं। पूंजी विरोधी है, रूसी चीनी नक्सली हैं। 

और फिर पाकिस्तानी, चीनी, नक्सली आप नही है, इसलिए भाजपा को वोट करते हैं। हिन्दू हैं, रामभक्त हैं, बीजेपी को वोट देंगे ही। 
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भाजपा को इसलिए न महंगाई की चिंता है, न बेरोजगारी की। उसे अपना संगठन पालना है, आपके बच्चे नही।

उसकी प्राथमिकता, महंगाई बढ़ाए रखना है। मुनाफा, फंडिंग बढ़ाये रखना है। 

और आपको पगलाए रखना है। 
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इस पोस्ट के नीचे भी ऐसे कमेंट करने वाले आएंगे, जिन्हें मिलने वाले 2 रुपये, उसी मुनाफे से मिल रहे है.. जो उनके बापो को रोटी, कपड़ा, तेल, दवा - बेजा कीमत पर बेचकर वसूला गया था। 

इन जैसो क, ऐसे वोटरों के रहते, मोदी बहुमत या अल्पमत में शपथ लेते रहेंगे। और ठसके से कहेंगे। 

मतलब नही महंगाई से
बेपरवाह हूँ बेरोजगारी से..

Thursday, June 6, 2024

झूंझनू का झुनझुना- जगदीप धनखड़

झूंझनू का झुनझुना..  

राजस्थान में झूंझनू शेखावटी का पुराना शहर है। कभी कायमखानियो की राजधानी रहा और इसी इलाके में वह खेतड़ी स्टेट भी आती है, जहां से नंदलाल नेहरू कभी दीवान हुआ करते थे।

यहाँ कभी स्वामी विवेकानंद के चरण पड़े, और रामकृष्ण मिशन को बड़ी मदद मिली। 

1951 जब पहली बार भारत के इलेक्शन होने वाले थे, एक जाट परिवार में जगदीप साहब का जन्म हुआ। 
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जगदीप वो फिल्मों वाले कॉमेडियन नही, मैं बात धनखड़ साहब की कर रहा हूँ, जो राज्यसभा के धड़ाधड़ सस्पेंशन को लेकर सुर्खियों में है। जिनका कॉमेडी बनाते कुछ माननीय, पकड़े गए हैं। 

बहरहाल झूंझनूरत्न धनखड़, पेशे से वकील रहे है, और आपको जानकर अचरज होगा कि वे संवैधानिक मामलों के वकील रहे हैं। 

झूंझनू बार काउंसिल में लम्बे समय तक वकालत करने के बाद, वे वीपी सिंह के जनता दल से जुड़े। 

1989 में चुनाव जीता, झूंझनू से सांसद बने।इसके बाद झूंझनूरत्न, अलग अलग पाजेब में घुंघरू की तरह बजते रहे हैं।  
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वीपी सरकार के गिरते ही, चंद्रशेखर सरकार बनी। चार माह की इस सरकार में, वीपी को छोड़कर आये प्रथम बार के सांसद धनखड़, सीधे संसदीय कार्य मंत्री बने।

चार माह में वो सरकार धूल चाट गयी, तो वे कांग्रेस में लटक लिए। 1991 में अजमेर से चुनाव लड़ा, और बुरी तरह हार गए। 

फिर 1993 में कांग्रेस के टिकट पर किशनगढ़ से विधायकी में हाथ आजमाया, और जीत गए। पर कांग्रेस हारी, शेखावत मुख्यमंत्री बने।

1998 में कांग्रेस तो जीती, गहलोत पहली बार सीएम बन गए। मगर पूर्व केंद्रीय मंत्री धनखड़, विधायकी में भी खेत रहे। उन्हें भाजपा के नाथूराम ने हरा दिया।
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1998 में वे झूंझनू से सांसदी लड़े, और हार गए। अब कांग्रेस में बजने का वक्त खत्म हो चुका था। 

2003 में हवा का रुख भांपा और भाजपा का झुनझुना बजाने लगे। 14 साल में यह चौथा दल था। 

पर यहाँ वे बियाबान में खो गए। अगले 17-18 साल वे पार्टी की लीगल सेल में मामूली काम करते रहे कि फिर, एक दिन उनके भाग से छींका टूटा।
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भोले भंडारी ने उन्हें उठाया, और झाड़ पोंछकर सीधे राजभवन में टपका दिया।

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में वे बजे, और क्या खूब बजे।

दरअसल, इतिहास में अब तक राज्यपाल को केवल नाममात्र का मुखिया माना जाता रहा। मगर 2019 के बाद का दौर अलग है। 

राज्यपाल का ऑफिस, पार्टी का कार्यालय और निर्वाचित सरकार के कामो को अड़ंगे लगाने का अड्डा बन गया है। राज्यपाल, विंधानसभा के पारित कानूनों को येन केन लटकाए रखने, मुख्यमंत्री से वाद विवाद करने और ब्यूरोक्रेसी को पैरलल निर्देश देने का काम करते हैं।

इन बिंदुओं पर धनखड़ साहब ने हाई स्कोर हासिल किया। पश्चिम बंगाल राजभवन और मुख्यमंत्री कार्यालय के बीच बदसूरत बहसों का गवाह बना। 

यहां तक कि रोज रोज उन्हें मेंशन करके ट्वीट करने से तंग आकर ममता बैनर्जी ने अपने ट्विटर पर उन्हें ब्लॉक कर दिया। 
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जाहिर है, इतिहास में यह उपलब्धि किसी सिटिंग राज्यपाल ने आज तक हासिल नही की थी। वे तो उपराष्ट्रपति के पद पर योग्य कैंडिडेट के लक्षण थे। सो उन्हें इस पद से नवाजा गया।

ये पद, यूँ तो सम्विधान में, स्टेपनी की तरह पीछे बैठे रहने के लिए बनाया गया है। पर उपराष्ट्रपति को व्यस्त रखने के लिए यह व्यवस्था है कि वे राज्यसभा के पदेन सभापति भी होते हैं। 
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अमूमन उपराष्ट्रपति सदन में कम बैठा करते थे। उपसभापति ही यहां का काम धाम सम्हालते। मेरी स्मृति में प्रागेतिहासिक काल से नजमा हेपतुल्लाह भारत की राज्यसभा की उपसभापति हुआ करती थी।

पर अब धनखड़ दिन भर सदन में बैठते हैं, मखौल बनवाते हैं, कभी ट्रोलिंग से दुखी होते हैं, कभी मिमिक्री से। समय बचे तो सांसद सस्पेंड भी करते हैं। 
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ये संस्थाओं और संवेधानिक पदों पर गिरावट का स्वर्णयुग है। पतन ही उत्थान का सर्वोत्तम मार्ग निर्धारित किया गया है। ऐसे में धनखड़ साहब कुछ बरसों बाद राष्ट्रपति बनाये जा सकते हैं। 

बहरहाल कभी राजीव के खिलाफ खड़े वीपी के साथ रहे, फिर उनके खिलाफ खड़े चंद्रशेखर के साथ रहे, फिर उनके खिलाफ रही कांग्रेस के साथ रहे, फिर उसके खिलाफ रही भाजपा के साथ खड़े पूर्व सांसद धनखड़... 

अब सांसदों के खिलाफ खड़े हैं।

141 नाबाद की पारी खेल रही सरकार के झुनझुने बनकर वे इतिहास में नाम कमा चुके हैं। सांसदों और जनता से सम्मान की गुहार लगाते झूंझनू के तत्कालीन सांसद की ये पुरानी तस्वीर है। 

जिसे देखकर दुष्यंत कुमार की पंक्तियां याद आती हैं - जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में, 

हम नहीं हैं आदमी, 
हम झुनझुने हैं ..

ओम बिरला के रहते, संसद के माथे पर काला दाग...!

संसद के माथे पर काला दाग .. !!!

ओम बिड़ला को जब याद किया जाएगा, तो लोगों के जेहन मे भावहीन सूरत उभरेगी। सदन के सबसे उंची गद्दी पर बैठा शख्स, जो संसदीय मर्यादाओं को तार तार होते सदन मे अनजान बनकर मुंह फेरता रहा। 

मावलंकर, आयंगर, सोमनाथ चटर्जी और रवि राय ने जिस कुर्सी की शोभा बढाई, उसे उंचा मयार दिया.. वहीं ओम बिड़ला इस सदन की गरिमा की रक्षा मे अक्षम स्पीकर के रूप मे याद किये जाऐंगे। 
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पांच साल तक, ओम बिड़ला के दौर मे संसद रबर स्टाम्प बनी रही। 

सदन बहस करने से बचने का अड्डा हुआ... 
सत्ता पक्ष कुछ भी कहे, अभय.. 

और विपक्ष को मुश्किल से दिये मोैको मे भी मूक बना देने वाले अध्यक्ष ओम बिड़ला थे। 

कही सामान्य कानून मनी बिल बनकर पास होते रहे तो कभी सांसदों को सस्पेंड़ कर विपक्षहीन कार्यवाही चलती रही। जिसकी सदारत मे सदन के भीतर मे बैठ जा मुल्ले गूंजा, और अध्यक्ष ने आंखें फेर ली।   
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सदन जितना आंखों के सामने चलता है, उससे ज्यादा परदे के पीछे। कौन से सवाल लिए जाऐंगे, कौन से रिजैक्ट होे। 

कौन सा सांसद बोलेगा, किसे मौका नही देंगे। किसके घंटे भर की सस्ती जोकरपंथी, संसद के इतिहास मे लिखी जाएगी, और किसके पांच मिनट के भाषण को कार्यवाही से मिटा दिया जाएगा। 

और संसद का टीवी किसके उपर कैमरा ताने रखेगा, और कब वक्ता के पूरे दस मिनट के भाषण मे संसद के झूमर पर टिका रहेगा?? 

सब तय करने का अधिकार ओम बिड़ला को था। 

और वे, जो सदन के अभिभावक बनाऐ गए थे, दलो के दलदल से उपर, न्यायाधीश की कुरसी से नवाजे गए थे, उस पद की गरिमा से पतनशील हो, 

मामूली पिटठू बनकर रह गए। 
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सबसे ज्यादा शर्मनाक, और खतरनाक काम था - विपक्ष को बाहर कर, खाली सदन से नई न्याय संहिता पर मुहर लगवाना। 

150 साल पुराने, ट्राइड, टेस्टेड और इवॉल्यूशन की नैचुरल प्रक्रिया से बनी भारत की संपूर्ण न्याय प्रणाली को आमूलचूल बदलने वाला बिल, मिनटों मे पास हो गया। 

बिना बहस, यह अधूरा, ड्रेकोनियन, दमनकारी, अंग्रेजों के कानून से कठोर और एन्टी डेमोक्रेसी प्रावधानो वाली भारतीय न्याय संहिता, राष्ट्रपति से दस्तखत हो चुकी है। किसी भी दिन नोटिफाई होकर लागू होगी। 

और उसके बाद गले से आवाज भी निकालना, छह माह की बिना ट्रायल जेल का सबब बनेगा। आम कानून को पीएमएलए बना दिया गया है। प्रावधानों को ऐसा महीन बुना गया है कि जब जहां मर्जी हो, एक थानेदार आपका जीवन नष्ट कर देगा। दूसरी ओर आपके न्याय की गुहार, सुनवाई अयोग्य मानकर ठुकरा देगा। 

यह न्याय संहिता, प्राकृतिक न्याय और सुनवाई के अधिकारों से चतुराई भरा महीन खेल करती है। इस कानून के लागू होने के बाद भारत जानेगा, कि असली मजबूत सरकार, असली पुलिस राज और सराकरी आतंक क्या होता है। 

और जब कोई हिंदुस्तानी इसमे फंसेेगा, तो इस पार्टी का समर्थक रहा हो या विरोधी - वह मोदी-2 और ओम बिड़ला को दिल की अनंत गहराइयों से..

सदियों तक शाप देगा। 
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सुनते है कि स्पीकर पद की मांग, तेलगूदेशम ने की है। यह शुभ संकेत है। एक हंग पार्लियामेण्ट मे विपक्ष की आवाज, संसदीय मर्यादाऐं का हनन.... 

दलो केे भीतर तोड़फोड, सांसद खरीदी और नीच तकनीकों के इस्तेमाल होने की छूट देने के लिए, किसी ओम बिड़ला जैसे भाजपाई को संसद की आसंदी नही मिलनी चाहिए। 

जीएमसी बालयोगी जैसे हरदिल अजीज, संतुलित लोकसभाध्यक्ष देने वाले तेलूदेशम और नायडू पर मोदी गैंग के भाजपाईयों से ज्यादा भरोसा किया जा सकता है। 

खुद तेलगू देशम, जेडीयू और दूसरे दलो की तोड़फोड़ की तमाम गुंजाइश खत्म हो जाएगी, अगर सदन की बागडोर एक संतुलित मष्तिष्क वाले क्षेत्रीय दल के हाथ मे हो। 
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नई संसद के सांसद, वे पक्ष के हो या विपक्ष के, याद रखे - बंदर के हाथ माचिस नही होनी चाहिए। 

और संसद की चाभी किसी बिडला के हाथ नही होनी चाहिए। आसंदी पर हमारी और उनकी भलाई इसी मे होगी। 

देश को और ओम बिड़ला नही चाहिए।    
लोकसभा के माथे पर, और काले दाग नहीं चाहिए।

Thursday, May 30, 2024

क्या आदिवासी समाज नक्सल है? All eyes on AADIVASI



आप लोग All Eyes on RAFAH या All Eyes on POK ट्रेंड करें, मुझे कोई दिक्कत नही है.

भारत से 4,000 किलोमीटर दूर दूसरे देश की आंतरिक समस्या पर हमारे लोगों में बहुत रुचि है. और होनी भी चाहिए. जहां कहीं भी शोषण और अत्याचार होता है आवाज उठानी चाहिए.

लेकिन हमारे देश के भीतर ही आदिवासी बहुल इलाकों में आदिवासियों को नक्सली बताकर मारा जा रहा है. उनकी ज़मीनी छीनकर कॉरपोरेट जगत को दी जा रही है. कॉरपोरेट जगत खनिज संपदा लूटकर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं,

और यह सब आदिवासियों को कुचलकर किया जा रहा है.

आदिवासियों पर किया जाने वाला शोषण आज तक कभी किसी न्यूज़ चैनल पर राष्ट्रीय खबर नही बना.

गांधीवादी और सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने बस्तर क्षेत्र में कई सालों तक काम किया है. उनका कहना है CRPF आदिवासियों को नक्सली बताकर मार देते हैं. बच्चों को भी नही छोड़ते. और यह सब गांव खाली कराने के नाम पर किया जाता है ताकि आदिवासियों की ज़मीन कॉरपोरेट को दी जा सके.

ALL EYES ON ADIVASI भी ट्रेंड होना चाहिए. हमारी संपन्नता, विकास और आधुनिकता, आदिवासियों को कुचलकर हासिल नही की जानी चाहिए.

Photo : TRIBAL WOMEN MILLION DOLLAR SMILE.

क्या सच में एलविश यादव पगला गया है?



आज आपको बताता हूं कि ध्रुव राठी और एलविश यादव में क्या अंतर है? और आपको यह भी बताऊंगा कि एलविश यादव को देखकर आपके बच्चों पर क्या फर्क पड़ेगा और ध्रुव राठी को देखकर क्या असर पड़ेगा?

देश में भीषण गर्मी पड़ रही है तो उस गर्मी के पीछे की वजह बताने के लिए ध्रुव राठी ने एक वीडियो बनाई उस वीडियो में ध्रुव राठी ने 

Trade winds 
El Nino 
La Nina 

जैसे तमाम साइंटिफिक टर्म्स बताकर समझा रहे हैं वहीं 

एलविश यादव की आज की ही वीडियो में वो बोल रहा है कि 

ये भगवान ने क्या कर रखा है यार, भगवान हमारे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? टेंपरेचर 45, 46, 50 डिग्री पहुंच रहा है।

ध्रुव राठी अपने फॉलोअर्स को एक्चुअल साइंटिफिक रीजन बता रहा है गर्मी का, जबकि एलविश यादव ने अपने फॉलोअर्स को गर्मी बढ़ने का कारण भगवान को बताया है।

ईश्वर आस्था का विषय हैं मगर यहां एलविश यादव उन्हें गर्मी बढ़ने का रीजन बता रहा है।

पंचायत Season 3 आपको कैसा लगा?


Panchayat- 3 Review 
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पहला एपिसोड- महा स्लो, दूसरा एपिसोड- बोरिंग, तीसरा एपिसोड- लास्ट में जाकर मामूली सा इंट्रेस्टिंग। चौथा, पाँचवा, छठा, सातवाँ एपिसोड वापस पुराने पंचायत के जैसा। मतलब अच्छा, काफ़ी अच्छा।

इस बार पंचायत के साथ दिक़्क़त शायद ये रही कि इसमें “प्रधानमंत्री आवास योजना” को अप्रत्यक्ष रूप से दिखाया गया। यूट्यूब के चलते चूँकि ब्रांड डील्स, और मार्केटिंग के लोगों से भी मिलना-जुड़ना हुआ। इसलिए इसकी संभावनाएँ लगती हैं कि पंचायत के सीजन-3 में सरकारी स्पॉन्सरशिप का पैसा लगा। अन्यथा ऐसे सीधे बिना पैसे के कोई प्रमोट नहीं करता। इतना तो समझ आता ही है। शुरुआती तीन एपिसोड बोरिंग होने का कारण यही है। प्रधानमंत्री आवास योजना को फिट करने में कहानी नहीं बन सकी। दूसरा- उप प्रधान @malikfeb जिन्हें लोग हंसने, खेलने गुदगुदाने के लिए देखना चाहते हैं। उन्हें शुरुआती 3 सीजन में रुलाने में ही खर्च कर दिया गया। एक सही आदमी को ग़लत काम लंबे समय तक खिंचाया। ओवरऑल जितना सीरीज़ निर्माता अपनी इस सीरीज़ से आत्मीय तौर पर जुड़े हुए हैं। उतना ही दर्शक के रूप में हम भी उनके काम से इमोशनली जुड़े हुए हैं। पंचायत अब सीरीज़ ही नहीं बल्कि भावनाओं का एक सामूहिक मिलन है। बाक़ी के दो सीजन इतने अधिक अच्छे रहे कि तीसरा सीजन उसके आगे हल्का पड़ रहा है। हालाँकि पंचायत के दर्शक होने के नाते सभी एपिसोड देखे, अन्यथा शुरुआती तीन एपिसोड ने भयंकर बोर किया। लेकिन अंत तक आठवाँ एपिसोड आते आते उस बोरियत की भरपाई हुई। कुल मिलाकर अच्छा सीजन है। हालाँकि शुरुआत में इतना बोर कर दिया कि बाक़ी एपिसोड के अच्छे होने के बावजूद प्रशंसा के लिए दिल उतना खुल नहीं पा रहा जितना कभी पंचायत के पहले दो एपिसोड की प्रशंसा की। पंचायत के डायरेक्टर और लेखक पर अब काम अतिरिक्त बढ़ चुका है। उनसे अपेक्षाएँ अधिक बढ़ चुकी हैं। उन्होंने पिछले दो सीजन में इतना अच्छा काम कर दिया है कि अब दर्शक के रूप में उस बेहतरीन काम में कुछ भी उन्नीस बीस हम नहीं चाहते। पंचायत में लास्ट में गोलीबारी के जो सीन दिखाए वह पंचायत को गैंग्स ऑफ़ वासेयपुर बनाते हैं। संभवतः पंचायत की खूबी उसके पंचायत होने में है। उस निर्दोषपन को बचाए रखने में ही डायरेक्टर पंचायत के तत्व को बचा पाएँगे। बहुत हल्की हल्की शिकायतें हैं। बाक़ी सब प्रशंसा। पंचायत के प्रत्येक करेक्टर और उसकी एक्टिंग की मुक्त कंठ से प्रशंसा। व्यक्तिगत रूप से मैं- उप प्रधान, प्रधान, सहायक सचिव की एक्टिंग का फैन हूँ। पंचायत की बाक़ी टीम के भविष्य के लिए शुभकामनाएँ। उम्मीद करता हूँ मेरी आलोचना को वे व्यक्तिगत नहीं लेंगे।

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Wednesday, May 29, 2024

हार्दिक पांड्या और सर्बियन मॉडल नताशा के बीच तलाक का कारण क्या हो सकता है?



क्रिकेटर हार्दिक पांड्या सर्बियन मॉडल नताशा के साथ रिश्ते में आने से पहले एक बंगाली मॉडल लिशा के साथ लिव इन रिलेशनशिप में था।जब फेम मिली तो उस ने ब्रेक अप किया और अभिनेत्री एली अवराम के साथ लिव इन में रहने लगा।इसी दौरान नताशा भी अभिनेता अली गोनी जो आजकल ऋतिक रोशन की भूतपूर्व पत्नी सुजान के साथ लिव इन में रहता है उस के साथ लिव इन में रहती थी।फिर उन का ब्रेक अप हुआ और उस ने कारोबारी सेम मर्चेंट के साथ रहना शुरू किया। सैम की ही एक पार्टी में नताशा और हार्दिक मिले।फिर दोनो की मुलाकाते बढ़ी और दोनो ने अपने अपने पार्टनर के साथ ब्रेक अप किया ।दोनो एक साथ रहने लगे ।

फिर नताशा प्रेगनेंट हुई।हाला की उस ने शादी का जोर नही डाला था फिर भी हार्दिक ने शादी की।अब आप लोग को ये बात हजम न हो लेकिन भारत में काले या सांवले लोगो को गोरे बालक का मोह तो रहता ही है ! आम तौर पर कैथोलिक सर्बियन या रशियन लड़किया पहले चाहे जितनी वाइल्ड हो,शादी के बाद टिपिकल हाउस वाइफ बन जाती है।नताशा भी बनी।हार्दिक लड़कीबाज़ है ये बात ओपन सीक्रेट है।हार्दिक ने नताशा की प्रेगनेंसी के बाद नताशा के साथ शादी की।ये कम था इस के चलते पिछले साल दोबारा उस ने नताशा के साथ धूम धाम से ब्याह रचाया था ।फिर पिछले साल के मानसून में लंदन में एक लड़की के साथ नताशा ने हार्दिक को पकड़ा था।जब रिश्ते में बच्चा हो जाए न तो बहुत सारी चीजे एडजेस्ट हो जाती है।बच्चे के चलते नताशा ने वो मामला बढ़ाया नही।अब उस के बाद हार्दिक सुधरा या नही इस बात पर तलाक की खबरे निर्भर करती है।

और एक पीआर खबरे फैला रहा की नताशा इतने पैसे लेगी एंड ऑल,कोर्ट में बैठे बूढ़े जज मूडी होते है लेकिन पागल नही ! पीड़िता के पास जरूरत की ठोस वजह , उस के पार्टनर ने शादी में धोखा किया इस के पुख्ता सबूत या शारीरिक हिंसा के सबूत ये तीनो में से किसी भी खास चीज के सबूत न हो तो कोर्ट औरतों की नही सुनती ! बॉलीवुड के मशहूर तलाक जिस में पत्नी को दबाकर पैसे मिले जैसे की आमिर और किरण का तलाक या ऋतिक और सुजैन का तलाक।दोनो की अपनी वजह है।आमिर और किरण ने सिर्फ और सिर्फ अपनी इस्टेट को सिक्योर करने के लिए तलाक लिया है।रहते दोनो साथ ही है ।ऋतिक को सूजन ने एक अभिनेत्री के साथ पकड़ा था ।फिर उन का तलाक हुआ तब बातचीत के साथ प्रॉपर्टी बांटी गई आउट ऑफ कोर्ट जिसे कोर्ट में सिर्फ अप्रुव करवाया गया ।आज भी वो लोग अच्छे दोस्त है और अपने अपने पार्टनर के साथ मजे कर रहे ।बच्चो के नाम पर प्रॉपर्टी सेटल कर रहे !भूषण कुमार और दिव्या का सेम सीन है।भूषण ने सरे आम दो लड़कियों को रखा है। उस में से एक नंबर वन आइटम गर्ल है और दूसरी को आप भाभी २ के नाम से जानते है ! लेकिन दिव्या जानती है की भूषण अपने बच्चे से बहुत प्यार करता है इसलिए वो तलाक नहीं ले रही ।

मोहमद शामी बाद में चाहे जितना बड़ा प्लेयर बना हो या जो भी हो,कोर्ट में उस की शातिर पत्नी ने शामी की हिंसा और बेवफाई के सबूत पेश किए थे ।आजकल कोई भी असली नकली खबर या अफवाह देख कर लोग आसानी से प्रतिक्रिया दे देते है लेकिन चीजे जैसी दिखती है वैसी होती नही है !

हार्दिक पांड्या ने शादी से पहले बच्चा किया
हार्दिक पांड्या ने पहले कोर्ट मैरिज की
हार्दिक पांड्या ने फिर क्रिश्चियन रीति रिवाज से शादी की
हार्दिक पांड्या ने फिर हिंदू रीति रिवाज से शादी की

वैसे तो शादी होने पर अपने पार्टनर के साथ सब इन्वॉल्व होते हैं मगर हार्दिक पांड्या ने इसे तरह तरह के उत्सव मना कर और भी बहुत complicated बना लिया था।

इतना सब होने के बाद हार्दिक पांड्या की मनोदशा का अंदाज़ा उनके सिवाय और कोई भी नहीं लगा सकता है।
जिस मां के नाम प्रॉपर्टी बना रहा है शादी से पहले बच्चा करते मां का खयाल नहीं आया क्या।

पति पत्नी का तो चांस 1% है, भाई भाई का संपति विवाद तो युगों से देखा है।
अब तो माएं भी अधिकार हड़प लेती है, वैसे भी उनका रिश्ता तो  शुरू से अटपटा था। 
हार्दिक को देखकर लग रहा की प्रेगनेट करने के केस से बचने के लिए शादी कर ली फिर 8 महिने की गर्भवती पत्नी से हिन्दू रीति रिवाज से शादी कर ली। तब मां की याद और बाप की इज्जत का खयाल नहीं आया होगा उसको।

Post Credit: Aradhya Yadav

Friday, May 10, 2024

मोदी जी अपने कार्यकाल में कितनी सरकारी कंपनियां बनाई??



जवाहरलाल नेहरू ने 33 सरकारी कंपनी बनाई.

धरती के लाल, लालबहादुर शास्त्री ने अपने छोटे से कार्यकाल में 5 सरकारी कंपनियों का निर्माण किया.

इंदिरा गांधी ने सरकारी कंपनी बनाने में अपने पिता को भी पीछे छोड़ दिया. इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए 66 सरकारी कंपनी बनाई.

मोरारजी देसाई ने 9 और राजीव गांधी ने 16 सरकारी कंपनी बनाई.

न्यायप्रिय वीपी सिंह ने 2 और पीवी नरसिम्हा राव ने 14 सरकारी कंपनी का गठन किया.

एच डी देवी गौड़ा 3, आई के गुजराल 3 और अटल बिहारी वाजपेयी ने 17 सरकारी कंपनी का गठन किया. लेकिन 7 बड़ी कंपनियों को बेचा भी.

मनमोहन सिंह ने अपने 10 साल के कार्यकाल में 23 सरकारी कंपनी बनाई. और 3 को बेचा.

भारत के इतिहास में नरेंद्र मोदी ही एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने एक भी सरकारी कंपनी नही बनाई. बल्कि 23 सरकारी कंपनियों को बेच दिया.

मेरा काम आप लोगों को जानकारी से अवगत कराना है. बाकी आप समझदार हैं. जो मीडिया नही बताता वो मैंने बता दिया.

अब आगे क्या फैसला लेना है, निर्णय आपके हाथ में है.