Tuesday, April 30, 2024

Prajwal Revanna H.D. Deve Gowda के रिसते में कौन लगता है औऱ अभी चर्चा में क्यूं है??



एच डी देवी गौड़ा ही वो शख्स हैं जिन्होंने अपने राज्य के आईपीएस अधिकारी जोगिंदर सिंह को दिल्ली बुलाकर CBI प्रमुख इसलिए बनाया था, ताकि लालू प्रसाद यादव जी को चारा घोटाले में फंसाया जा सके.

लालू प्रसाद यादव जी पर शिकंजे की बुनियाद 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवी गौड़ा ने रखी थी. 

एक पिछड़े वर्ग का प्रधानमंत्री अपने ही पार्टी के पिछड़े वर्ग के मुख्यमंत्री को झूठे मुकदमे में फंसाता है.

आज देवी गौड़ा का पोता सेक्स स्कैंडल में फंस चुका है.

सेक्स स्कैंडल भी कहना गलत है, पहली नजर में यह बलात्कार स्कैंडल लग रहा है.

मित्रों आप लोगों को क्या लगता है. देवी गौड़ा के पोते पर कार्यवाही होनी चाहिए या नही ?


2500 वीडियो क्लिप और महिलाओं का यौन शोषण...सेक्स स्कैंडल में फंसे रेवन्ना को कितनी हो सकती है सजा?

रेवन्ना को कितनी सजा हो सकती है? 

प्रज्वल रेवन्ना के खिलाफ जो FIR दर्ज की गई है उसमें आईपीसी की धारा 354ए, 354डी, 506, 509 लगाई गई है. अब हम आपको बताते हैं कि आईपीसी की इन धाराओं में अगर रेवन्ना दोषी दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें अधिकतम कितनी और किस प्रकार की सजा हो सकती है. आईपीपीसी की धारा 354ए के तहत यौन उत्पीड़न का आरोप लगता है जिसमें दोषी पाए गए शख्स को अधिकतम 3 साल जेल की सजा और उस पर जुर्माना लग सकता है. वहीं रेवन्ना के खिलाफ धारा 354डी भी लगाई गई है जिसका मतलब गलत नियत से किसी महिला का पीछा करना होता है. इस धारा के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम 5 साल जेल की सजा और जुर्माना लग सकता है. वहीं रेवन्ना पर आईपीसी की धारा 506 (आपराधिक धमकी देना) के तहत उन्हें अधिकतम 7 साल जेल और जुर्माने की सजा मिल सकती है जबकि धारा 509 के तहत किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के आरोप में उन्हें अधिकतम तीन साल जेल की सजा और जुर्माना लग सकता है.


#PrajwalRevanna #PrajwalRevannaPendrive #Prajwal


कोविशील्ड वैक्सीन से हो सकता है हार्ट अटैक !

दुनिया भर को सप्लाई की गई, और देश भर में सबको जबरन लगाई गई, ये वैक्सीन, कभी भी इंडियन प्रोडक्ट नही थी। 
●●
ये ब्रिटिश एस्ट्राजेनेका द्वारा डेवलप वैक्सीन थी। और हमारे यहां अदार पूनावाला की फर्म ने उसका लाइसेंस लेकर, कोविशील्ड के ब्रांड नाम से मास प्रोडक्शन करके बेचा।

याने, जिस तरह पड़ोसी से चार चम्मच दही का मांगकर, हम उससे तसला भर दही जमा लेते है, वैसे ही से डेड वायरस का कल्चर एस्ट्राजेनेका से लेकर यहां उसकी मात्रा बढाई गयी, शीशियों में भरकर बेचा गया।

ये कोई पाथ ब्रेकिंग टेक्नॉलजी नही थी। महज एक कल्चर डेवलप किया गया था। जिसे एगर मीडियम पर बड़े स्केल में ग्रो किया जाना था। कोई भी लैब वाला कर सकता है। 

पर वहां तक पहुँच, और लाइसेंस फीस देने लायक पैसा होना चाहिए। फिर अदार को यह लाइसेंस इस शर्त पर भी मिला था, की उसके लैब से प्रोडक्शन का एक बड़ा हिस्सा, विदेशों में एस्ट्राजेनेका के क्लाइंट के लिए भेजा जाएगा।

●●
तो, अपने कॉन्ट्रैक्ट की शर्त के तहत, जब यहां कई राज्य, वैक्सीन के लिए एड़ियाँ रगड़ रहे थे, अदार अपनी दवा विदेश भेज रहे थे। 

इस सबमे भारत सरकार का योगदान एब्सोल्यूट जीरो था। लेकिन मौका ताक कर हमारे प्रधानसेवक ने "भारत पूरे विश्व को वैक्सीन दे रहा है" का शोर मचा दिया। 

मचा कर महफ़िल लूट ली। 
●●
लेकिन एस्ट्राजेनेका को सप्लाई से इससे अदार को खास फायदा नहीं था। इलेक्टोरल बांड की हिस्ट्री बताती है, कि मोटा चन्दा भारतीय जनता पार्टी को मिला। 

उसके आसपास इनकी दवा को भारत मे चटपट अप्रूवल और तिगुने दाम पर सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया। सरकार ने उसकी दवा फर्म से सप्लाई की 90% खरीदी की। 

जबकि भारतीय साइंस लैब की बनाई, बेहतर वैक्सीन "को वैक्सीन" को महज 10% सरकारी सप्लाई का ऑर्डर मिला। उनके द्वारा इलेक्टोरल बांड से चन्दा दिए जाने का कोई रिकार्ड नही मिला है। 

फिर हर यात्रा, और स्कूल कॉलेज, हर जगह, वेक्सिनेशन सर्टिफीकेट अनिवार्य कर दिया। डर का ऐसा माहौल बनाया गया, कि हर के लिए इसे लगवाना मजबूरी हो गयी। 
●●
हद तब थी,कि 90 रुपये कॉस्टिंग वाली वॉइल को, अदार की कम्पनी सेंट्रल गवर्मेन्ट को 400 रुपये और स्टेट्स को 1000 रुपये की प्राइजिंग कर रही थी।

इस पर भी खरीदने को तैयार उद्धव ठाकरे जैसे मुख्यमंत्री को सप्लाई मुश्किल से हो रही थी। शायद ये विपक्ष के सीएम थे, इसलिए??  

बहरहाल, कुछ माह के साल के अंदर, पूनावाला की छोटी से दवा फर्म, सिर्फ एक दवा से चोटी की फर्म बन गयी। महामारी खत्म हुई, अदार बिलयनेयर बन गए। भारत छोड़ा, लन्दन में मकान लिया।

शिफ्ट हो गए। आजकल अमीरों की मैगजीन में घोड़े पालते दिखाई देते हैं। 
●●
मुफ्त वैक्सीन के नाम पर भक्तों ने कूद कूद चरण वंदना की। सवाल करने वालो को गद्दार और विद्रोही बताया। जब नदियों का पाट लाशों से अटे पड़े थे, श्मशानों की चिमनियां पिघल रही थी, तब भी आत्मश्लाघा और प्रोपगंडा का नंगा नाच जारी था। 

श्रेय, पैसा, वोट- सब कुछ हासिल करने के बाद आज.. जब इस दवा के धीमा जहर होने की बात, एस्ट्राजेनेका ने स्वीकार कर ली है...

तो मौत के परकाले मौन है। भक्त चुप है। एक हजार करोड़ का दावा कम्पनी पर ठोका गया है, तो उसमे हिस्सेदारी करने कोई आगे नही आ रहा। 

वो मंगलसूत्र के मुद्दे, और सूरत-इंदौर के तरीकों से अब नया चुनाव लड़ने में मशगूल है। 
●●
मगर मेरे घर पर वह जहरीला सर्टिफिकेट आज भी रखा है। आपके भी घर मे होगा। 

उस सर्टिफिकेट पर आपके मां, पिता, भाई, बहन, पत्नी, पति, आपके बच्चो का नाम लिखा होगा। उसमे, उनके शरीर मौत घुसाने की तारीख लिखी होगी। उस पर अरबो हिंदुस्तानियों को मौत बाटने वाले शख्स की खिलखिलाती तस्वीर भी होगी।

वह सर्टिफिकेट खोजिए, निकालिए।
वो सूरत पहचानिये। 

क्योकि वह तस्वीर, अदार या एस्ट्राजेनेका कम्पनी के फाउंडर की नही है।



इसमे लिखे किसी भी शब्द के लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूं, क्युकी मैं इसकी पुष्टि नहीं कर सकता। मैंने इसे twitter post से उठाया है।

Monday, April 29, 2024

क्या इसे ममता कहते हैं? इसपर सवाल उठाना उचित भी है या नहीं?



एक बार माँ अपने बच्चे को छोड़ कर चली गई सिर्फ़ इसलिए कि बच्चा किसी कारण बस गुस्सा था और खाना ग्रहण नहीं कर रहा था।
माँ का emotional drama ऐसा था कि वो फुट-फुट कर रोने लगी कि ये अब मेरे हाथ का खाना भी नहीं खा रहा है।
फ़िर गुस्सा होकर वो घर छोड़ कर चल दी।
जबकि उनके पास possibility था कि वो बच्चे को खाना खिला सकती थी वो भी यहीं रहकर। कुछ बोल कर, किसी के द्वारा मनवा कर, मग़र माँ ने ऐसा नहीं किया।
जब माँ घर छोड़ कर चल दी तो क्या लगता है इसलिए अब बच्चा खा लेगा की माँ घर छोड़ कर चली गई, नहीं ऐसा नहीं है,, और जब भुख चरम पर होगा तो कुछ खा ही लेगा कौन सा आमरण अनशन पर बैठा है; अब तो माँ के पास खिलाने के लिए तो कोई विकल्प भी नहीं है क्युकी वो तो अब घर छोड़ जा चुकी है। 
अब कोई कहेगा तुम समझ नहीं सके, माँ इसलिए गई कि तुम खा लोगे। तो मैं बता दूँ ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि मैं इसलिए खा लूँगा की वो चले गए। 
ऐसा लगता है जैसे मैंने उन्हें घर छोड़ जाने को मज़बूर किया। पर नहीं उन्हें कहीं ना कहीं जाने का मन भी था इसलिए वो ये बहाना भी बना पाई। 
वो रोना, emotional drama करना कितना जायज था? क्या इसे ही "ममता" कहते हैं? 
हमें ये "ममता" समझ नहीं आता है। शायद मैं माँ नहीं हूं ना? 

Wednesday, April 17, 2024

UPSC CSE TOPPER


IAS Topper List with Marks (Mains+Interview) 
2014 - Ira Singhal - 1082
2015 - Tina Dabi - 1063
2016 - Nandini KR - 1120
2017 - Anudeep Durishetty - 1126
2018 - Kanishak Kataria - 1121
2019 - Pradeep Singh - 1072
2020 - Shubham Kumar - 1072
2021 - Shruti Sharma - 1105
2022 - Ishita Kishore - 1094

Top 10 AIR of 2023 CSE List(written-Interview-Total) 
AIR-2 ANIMESH PRADHAN(6312512)                - 
AIR-3 DONURU ANANYA REDDY(1013595)         - 
AIR-4 P K SIDHARTH RAMKUMAR(1903299)    - 
AIR-5 RUHANI(6312407)                                 - 
AIR-6 SRISHTI DABAS(0501579)                     - 
AIR-7 ANMOL RATHORE(3406060)                   - 
AIR-8 ASHISH KUMAR(1121316)                      - 
AIR-9 NAUSHEEN(6016094)                              - 
AIR-10 AISHWARYAM PRAJAPATI(2637654)    - 


Top 10 AIR of 2022 CSE List(written-Interview-Total)

Ishita Kishore          - 901 - 193 - 1094
Garima Lohia           - 876 - 187 - 1063
Uma Harathi N         - 873 - 187 - 1060
Smriti Mishra          - 882 - 173 - 1055
Mayur Hazarika        - 861 - 193 - 1054
Gahana Navya James - 861 - 193 - 1054
Waseem Ahmad Bhat - 871 - 182 - 1053
Aniruddh Yadav        - 856 - 195 - 1051
Kanika Goyal            - 865 - 180 - 1045
Rahul Srivastava       - 863 - 180 - 1043

Top 10 AIR of 2021 CSE List


Top 10 AIR of 2020 CSE List

Top 10 AIR of 2019 CSE List

Top 10 AIR of 2018 CSE List

Thursday, April 4, 2024

"Focus on Rights for 75 Yrs has kept India weak"??

ये बयान एक उलझी हुई, अविकसित सोच का नमूना है। 

लेकिन बात समझाने के लिए फ्रांस की क्रांति (1787-1799) को समझना पड़ेगा। 
जो हर इंजीनियर(Engineer), सीए(CA), मैनेजर(Manager), दुकानदार(Shopkeeper) और पुजारी(Priest) को समझना चाहिए। 

फ्रेंच रिवोल्ल्यूशन, मानवीय इतिहास का एक टर्निंग प्वाइंट है, जिसने हमारी मौजूदा सभ्यता को शेप किया है। इसलिए हर देश मे, आज तक इसे पढा, पढाया और बांचा जाता है। 
●● 
आदि मानव से लेकर सत्रहवी सदी के राजतंत्र तक, हमेशा आम आदमी ..... किसी राजा की प्रजा रहा। 

पहली बार सत्रहवी शताब्दी मे फ्रांस के लोगों ने कहा- उन्हे भी गरिमा से जीने का अधिकार है। राजा को अपने कुकर्म, अने खर्च काबू रखने चाहिए। अगर टैक्स चाहिए, तो नागरिकों को भी कुछ अधिकार देने होगे। 

जीवन का अधिकार , कि राजा आपको जब चाहे मार न दे। न्याय का अधिकार, जब चाहे जेल न भेज दे, संपत्ति न लूट ले। 

बोलने का अधिकार हो, जुबान न खीच ली जाए। आप अपने देवता की पूजा कर सके। कोई शोशण न करे, ये नागरिक के मूलभूत अधिकार (Fundamental Rights) थे। 

जो पहली बार डिफाइन किये गए।  
●● 
राजा को मंजूर न था। सदियों से राजा की मर्जी ही कानून थी। श्रृष्टि के आरंभ से वो सब नियमों से उपर था, देवतुल्य था। जिसकी चाहे बीवी उठवा ले, जिसे चाहे फांसी टांग दे। सब उसका अधिकार था। 

इतिहास मे तो आज तक सिर्फ राजा के अधिकार की बात हुई थी। प्रजा के अधिकार भला क्या होते है। इस नई चीज को नकार दिया गया। तो फ्रांस की जनता चढ बैठी। 

राजा का तख्तो ताज उछाल दिया। सर कलम कर उसपे फ्रेंच रिपब्लिक बनाया। जहां जनता का शासन था। 

जहां सरकार के अधिकार तो थे, पर नागरिक के अधिकार भी उतने ही महत्पपूर्ण थे। यह इतिहास पलटने का वक्त था। 

समाज को पलटने का भी ...

●● 
लिबर्टी(Liberty), इक्वलिटी(Equality), फ्रेटर्निटी(Fraternity), जस्टिस(Justic) - फ्रेंच रिवोल्यूशन (French Revolution) से निकले ये शब्द पूरी दुनिया की आजाद सरकारो का एंथम(Anthem) है। 

आजादी, समानता, भाइचारा, न्याय हमारे संविधान के पहले पन्ने पर उद्येशिका मे लिखे है। ये आजाद भारत मे आजादी का उद्घोष था। 

आजादी सिर्फ अंग्रेजो से नही। मुगलो से नहीं। इतिहास की शुरूआत से चले आ रहे फ्यूडल सिस्टम से, सम्राटों, महाराजाधिराजों, राजे रजवाड़ों और उनके चंगुओं मंगुओं से।  

आजादी, वो फंडामेण्डल राइट्स ही हैं। 

याने चुनी हुई सरकार को अपने कुकर्म, खर्च काबू रखने होगे। चाहिए। अगर टैक्स चाहिए, तो नागरिकों के अधिकार बचाने होगे। जीवन का अधिकार - कि सरकार आपको जब चाहे मार न दे। 

न्याय का अधिकार- जब चाहे जेल न भेज दे। संपत्ति न लूट ले। आपको बोलने का अधिकार हो, जुबान न खीच ली जाए। 

आप अपने देवता की पूजा कर सके, आपका कोई शोशण न करे, यह सरकार को सुनिश्चिित करना चािहए।
●● 
ये जो हिंदुत्व, चाणक्य, चंद्रगुप्त, पृथ्वीराज और शिवाजी और श्रीराम का नाम लेकर आपके गले उतारते है, वो गर्व दरअसल भांग है। 

वो थ्योरी कहती है कि फ्यूडल राजा के दिन बढिया थे। उसका दौर बढिया था। 

हम तब सोने की चिडिया थे, 
हीरे का कौआ थे, विश्वगुरू थे, वगैरह। 

वो सोना-हीरा राजा और जमींदार के घर मे भरा था साहब। ब्राह्मण तो हर कथा मे गरीब था। ठाकुर, क्षत्री, तेली, दलित तो फिर छोड़ ही दीजिए। 

जनाब, श्रीराम से शिवाजी तक, आम आदमी के कोई सिविल राइट न थे। न वूमन्स राइट न थे, न जात पांत का बराबर हक मिला। सब जना हाथ जोड़े आराधना करो, और कृपा की उम्मीद करो। 

मिले ठीक, न मिला तो हरिइच्छा। 

राम राज और शिवाजी सदियो मे पक्का दुक्का आते। बाकी तो जालिम सिह और अययाश कुमार ही गद्दी पे लोटते रहे है। उनकी हाथजोड़ी, कृपाकांक्षा करते रहो... 5 किलो राशन पाओ। 

क्या ऐसा गर्वीला जमाना चाहिए आपको ?? 
सोचकर बताइये। 
-
400 पार होने पर संविधान बदलेगा। 

यह बोलने वाले को भले चुप करा दिया गया हो। लेकिन यह RSS का जनरल कन्सेसस है। ये तैयार बैठे है। और जब बदलेगा.. 

तो आपके अधिकार बढेगे नही। घटेगे ... 

याद रहे। संपूर्ण संविधान मे आपके काम का कुछ नहीं।
सिर्फ मूल अधिकार ही आपका है। 

बाकी तो सब सरकार का - राष्ट्रपति के अधिकार, मंत्रीपरिषद के अधिकार, कोर्ट के अधिकार। बंगला कोठी, सैलरी। भला उनके अधिकार से आपको क्या मिलना है ?? 

आपका है फण्डामेटल राइट। 

अच्छी सरकार, अच्छा नेता, जो जनता का ख्याल रखे. वो अपने अधिकार काटकर जनता को देता है। 

छोटा जिगर, छोटा दिल, अपनी ताकत को जनता के अधिकार काटकर ताकत बढाता है। आफकोर्स, देश हित मे, देश सुधारने को लिए बढाता है। 

लेकिन ऐसे लोग Past मे जीते है। खुद को रोमन एम्प्ररर, सम्राट, हरदिल अजीज मसीहा समझते है। इतनी ताकत ले लेते है कि तमाम इंस्टीट्यूशन के लिए कुछ नही बचता। 

सिस्टम उपर की ओर मुह ताकने वाला बनकर रह जाता है। नाकारा और यूजलेस हो जाता है।

ऐसे लोग सबकी ताकत छीन-छीन, अपनी कुर्सी के नीचे गाड़ते रहते है। एक दिन जब ईश्वर के पास चले जाते है। तो पीछे साम्राज्य, नेशन, देश, सल्तनत भहरा जाती है। 

भारत और विश्व का इतिहास (हां वो वामपंथी वाला), जिन्होने पढा है, वो इस बात को समझते है। विकसित और सुलझे हुए लोग इस बात को समझते है। इसलिए कहा - 

ये बयान एक उलझी हुई, अविकसित सोच का ननूना है।



Tuesday, January 25, 2022

हॉस्पिटल का सफ़र

हॉस्पिटल का सफ़र
मैं निकल पड़ा हॉस्पिटल के शहर में।
मेरा जीवन एक सामान्य व्यक्ति की तरह बीत रहा था। मग़र मैं कभी हॉस्पिटल में भर्ती नहीं हुआ।
मेरे पिताजी मेरे हर छोटे-बड़े बिमारी में घर पर ही डॉक्टर को बुला लिया करते थे। जहां तक मैं ध्यान कर पा रहा हूं
कि हमें बिमारी में भी कोई बहुत ख़तरनाक रूप लेना वाला बिमारी कभी नहीं हुआ। कुछ बिमारी रहा
जिसमें से एक था विकलांगता और लू। मैं बचपन से ही पैर से विकलांग रहा था। मेरे पिता जी, माता जी, मामा जी एवं डॉ के
कठिन प्रयास से मेरे पैर को सामान्य पैर में बदला जा सका। आज मैं इस पैर के मदद से सामान्य जीवन जीता हूं, चलने फिरने से लेकर दौडता भी हूं।
अब तक मैं दौड़ में कई दफा पुरस्कृत किया जा चुका हूं, यहां तक की ग्रेजुएशन की डिग्री पुरा करते वक्त मैं इंटर कालेज 10 km मैराथन मैं भी गोल्ड रहा था।

एक दफ़ा हमें लु लग गया था जिसमें हम 10-15 दिन तक बीमार रहे थे। रोजाना सुबह-शाम सूई, औऱ पानी चढ़ाना, ढेरों दबाईयाँ सामान्य था।
मग़र हमारा ईलाज तब भी घर पर ही हुआ था. मैं हॉस्पिटल कभी भी भर्ती होने के लिए नहीं गया था ना ही किसी के भर्ती होने पर हमें वहां रहना पड़ा हो। इस वज़ह से 'अस्पतालों के चक्कर से' मैं पुरी तरह अवगत नहीं था. थोड़ा बहुत तो था जो मैं अख़बार या न्यूज चैनल पर देखा करता था.

एक वक़्त आता है 14 जनवरी 2022, जब हमें कॉल आता है, हमारे मामा जी का की मैं अस्पताल में भर्ती हूं मेरा तबीयत सही नहीं है। तुम्हें आना पड़ेगा.
मैं भी झट से निर्णय लिया और अस्पताल जाने को सोचा।
मैं अस्पताल पहुंच गया और मामा जी का देख-रेख करने लगा।

मैंने जो भी वहां देखा और अनुभव किया मैं वही लिखने जा रहा हूं।
मामा जी का स्वास्थ्य सुधरने के वजाय बिगड़ता चला गया।
मामा जी क़रीब 18-20 साल पुराने चीनी रोगी रहे थे। हॉस्पिटल के अनुसार सारा जाँच करा लिया गया था। 2 दिन बिताने के बाद शनिवार तक dialysis
होना चाहिए था मगर नo. पीछे आने के वज़ह से नहीं हो पाया।

आप उम्मीद करते होंगे ये तो किसी भी वक़्त हो जाना चाहिए। 24*7 सेवा सुचारु रुप से मिलना चाहिए. बात यहां तक कि नहीं है, dialysis उसके
दूसरे दिन भी नहीं हो सकता था चाहे आपका patients death ही क्यूं ना कर जाए. बात है ऐसा क्यों हुआ?

"क्यूं की अगला दिन 'इतवार' था."
सोचने की बात है, 'क्या इतवार को स्वास्थ्य व्यवस्था में ढिलाई देना चाहिए?'
'क्य़ा इतवार को बीमारी भी अपना छुट्टी ले लेता है?'
'क्या कुछ और तकनीशियन डॉक्टर रख कर इसे 24*7 नहीं किया जा सकता?'
'क्या इतवार को डॉक्टरों का अस्पताल में हाजरी संख्या सामान्य दिनों के तरह नहीं होना चाहिए? या ज्यादातर डॉक्टरों को छुट्टी दे कर
सिर्फ इमर्जेंसी रोगी को देखना सही रहेगा?'
सवाल तो उठता है सिर्फ़ इसलिए नहीं कि मेरे मामा जी तकलीफ़ में थे। इसलिए कि ऐसे व्यवस्था के चलते कितने लोगों का मृत्यु हो जाता होगा।
जिसका गिनती भी आपको सही से नहीं मिलेगा।
जैसे मैं आपको आंखों देखा उद्धरण देता हूं।
मैंने अपने आँखों से एक प्रेगनेंट महिला को दर्द से कराहते हुए मरते देखा.
वज़ह, वार्ड में नर्स के द्वारा मरीज़ के अभिभावक को बार-बार emergency वॉर्ड में जाने को कहने पर उसका पति स्ट्रेचर के लिए अस्पताल में ढूँढता
औऱ स्ट्रेचर वाले को आवाज लगाता है, वहाँ के स्टाफ़ से बोलता है।
महज़ 20mins बाद वो स्ट्रेचर वाला सुनता है औऱ आता है तब तक वो महिला अंतिम साँसे गिन रहीं होती है.
मग़र वो स्ट्रेचर वाला कहता है इसको इमर्जेंसी वॉर्ड में ले जाकर भी क्य़ा कीजिएगा, वहाँ भी आपको अभी डॉक्टर नहीं मिलेंगे. अभी उनका समय नहीं हुआ है. (मतलब वो 9:00-9:30am तक आते हैं).
वो स्ट्रेचर वाले तभी इस लिऐ नहीं सुनना चाह रहे थे क्योंकि उसका ड्यूटी महज कुछ ही मिनटों में समाप्त होने वाला था। उसे अपनी छुट्टी पड़ी थी।
अंततः आत्मा ने उस महिला के शरीर को छोड़ दिया.
उसका परिवार देखता रह गया. अस्पताल में भर्ती होने के वाबजूद अस्पताल के स्टाफ़ औऱ डॉक्टर के लापरवाही के चलते जान चला गया.

"कहने का मतलब यह है कि इस प्रकार से कितनों लोगों का जान जाता होगा."
कई दफा मिडिया संस्थाओं को ऐसी ख़बर मील जाती है तो रिपोर्टिंग हो जाती है, कई दफा इसे दवा भी दिया जाता है।
इसलिए आप सभी से विनती है ऐसी रिपोर्टिंग देख कर आप ये ना सोचे की देश में सिर्फ़ एक ही ऐसा घटना घटित हुआ होगा।
नीत दिन ऐसे केस ढेरों होते होंगे जो मीडिया में कई कारणों से सामने आ ही नहीं पाता होगा. जैसे यह उद्धरण,
जिसका मैंने ऊपर ज़िक्र किया है। इसलिए भी स्वास्थ्य व्यवस्था पर हुए रिपोर्टिंग का समर्थन करें।

ये सारी घटनाओं को मेरे मामा जी एवं और भी दूसरे मरीजों ने देखा। कितने लोग उस वार्ड में रोने लगे तो किसी ने गुस्सा प्रकट किया।
मगर होना क्या था। वो जिन्दा तो हो नहीं सकता था।
अंत में मृत शरीर को ले जाने के लिए दुसरा स्ट्रेचर वाला आता है, उसने भी वहाँ उपस्थित रहे लोगों का गुस्सा देख पहले वाले व्यक्ति पर गुस्सा दिखाया। (जो व्यक्ति पहले स्ट्रेचर ले कर आया था।
मेरे मामा उस घटना को देख जीने लगे और कहने लगे 'देखो ऐसे ही होता है दम फुलने पर फिर दम टूट जाता है, एक दिन सबको जाना है' जैसी बातें।
हमारे मामा जी का तबीयत और बिगड़ता जा रहा था, उल्टी रूकने का नाम ही नहीं ले रहा था साथ में दम फूलना और पेट में दर्द।
समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ। बार-बार डॉ और नर्ष के कमरे के पास चक्कर लगा रहा था और परेशानि बताने का कोशिश करना।
हर बार डॉक्टर लिस्ट में एक नया दवा या इंजेक्शन जोड़ देते थे। नर्ष भी सिर्फ़ सुई देने के समय पर वार्ड में उपस्थित होती थी बांकी वक्त अपने कमरे में।
इंजेक्शन देने का रफ्तार इतना ही समझा जाए जैसे ट्रेन छुटने वाला हो।

पहला दिन जब भर्ती हुए थे अपने से चल पा रहे थे ऐसे जैसे उन्हें कुछ परेशानी ही नहीं हो। अंतिम दिन तक उन्हें पिसाब भी वहीँ पर कराना पड़ा था।
हम सभी( जो भी मामा जी के पास थे) ने मामा जी का serious हालत देख सरकारी अस्पताल से निजि अस्पताल में ले जाने के लिए सोचा। 🤔
बात ये नहीं है, बात ये है की पहले इन्हें निजि अस्पताल से ही सरकारी अस्पताल ज़े.एल.एन.एम.सी.एच. भागलपुर में भेजा गया था।
फ़िर सरकारी से मजबूरन निजि अस्पताल।

कहानी आगे चलता गया फ़िर dialysis भी हुआ, fistula भी बना।
इस दौरान कई डॉ बदले, शहर बदले, हालात बदले। अगर ये सरकारी अस्पताल में हो गया होता तो "प्राइवेट लुट" से तो जरूर बचते।
बीच में आ गया "डॉक्टरों का लापरवाही और इतवार।"

Note:- इस पूरे आर्टिकल का उद्देश्य है सरकारी अस्पतालों को व्यवस्थित करना, उसकी जरूरत को एवं लापरवाह व्यवस्था को दर्शाना।